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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 534 में से

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भूगोल सम्बन्धी वर्णन २१
कि उक्त शिलालेख में उल्लिखित खान आलम मकवलखां, जो मालवे के
मुसलमानों की तरफ़ से इस प्रदेश का शासन करता था और जान आलम
एक ही व्यक्ति हों। संभव है कि उसने अपने रहने के लिए यह स्थान
बनवाया हो।
घोटार्सी—प्रतापगढ़ से ७ मील पूर्व में घोटार्सी नामक प्राचीन नगर
है। संस्कृत में इसका नाम घोंटार्वषिका मिलता है। यहां दूर-दूर तक
भूमि के भीतर से बड़ी-बड़ी ईंटें निकलती हैं और कई मंदिरों के अवशिष्ट
चिन्ह भी दृष्टिगोचर होते हैं तथा बहुत से खुदाई के कामवाले पत्थर
इधर-उधर बिखरे हुए मिलते हैं, जिनसे अनुमान होता है कि पहले यह
स्थान बड़ा ही संपन्न था और यहां कई मंदिर आदि थे। यहां एक मंदिर
है, जिसको भेरूंजी का मंदिर कहते हैं। उसके नीचे का भाग सुंदर खुदाई-
वाला और प्राचीन है तथा ऊपरी भाग का समय-समय पर जीर्णोद्धार हुआ
हो ऐसा पाया जाता है। उक्त मंदिर के चबूतरे पर तोरण के टुकड़े, देवी,
विष्णु आदि की टूटी हुई मूर्तियां पड़ी हुई हैं, जो वहां के मंदिरों की
होंगी। तालाब की पाल पर नवग्रह आदि की मूर्तियां एवं खुदाई के काम-
वाले बहुत से पत्थर बिखरे पड़े हैं और अब तक कुछ ऐसे अंश विद्यमान
हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि तालाब के निकट कई मंदिर बने हुए होंगे।
यहां 'इन्द्रराजादित्यदेव' नामक सूर्य मंदिर था, जिसको 'तरुणादित्य-
देव' भी कहते थे। इस सूर्य के मंदिर को चौहान-वंशीय इन्द्रराज ने, जो
दुर्लभराज का पुत्र और गोविन्दराज का पौत्र था, बनवाया थौ। वि० सं०
९६६ श्रावण सुदि १ (ई० स० ६४२ ता० १७ जुलाई) को मेवाड़ के गुहिल-
ते निकर कीयो जे कोइ मुसलमांन होइ कर लेयै तेकूं सुअर की गेड़
हीन्दु हो तो कर लेयै तेहे गाइ की साईगें (सौगंध) है।
गौतमेश्वर के मूल शिलालेख की छाप से !
( १ ) यस्माद्वि(द्वि)भ्यति विद्विषः किमपरं यस्माच्च लक्ष्मीनृणां[1]
सोयं राजति राजचक्रनिलयः श्रीचाहमानान्वयः [॥ ५ ॥]