राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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और खास सेवाओं को दृष्टि में रखकर किया जाता था । यद्यपि समय के
परिवर्त्तन से अब देशी राज्यों में यह प्रथा मिटती जाती है और प्रतापगढ़
में स्वर्गीय महारावत रघुनाथसिंह के राज्यकाल से ही मंत्री-वर्ग में बाहरी
आदमियों को स्थान मिलने लगा है तथापि किसी न किसी अंश में
दायित्वपूर्ण पदों पर वंशपरंपरा के अनुसार वहां के निवासियों की ही
नियुक्ति होती है ।
इस राज्य के पहले के प्रायः सब मंत्री दिगंबर सम्प्रदाय के हूंबड़
जाति के व्यक्ति हुए हैं । बागड़ के पूर्व-निवासी होने से साधारण बोलचाल
में वे भी बागड़िया हूंबड़ कहलाते हैं । व्यवसाय-प्रधान जाति होने से
हूंबड़ों की गणना वणिकों में होती है । पहले उनका बागड़ ( डूंगरपुर और
बांसवाड़ा ) राज्य में निवास था और वे बहुत सम्पन्न थे । महारावत
विक्रमसिंह के कांठल जाकर वहां अपना स्थायी निवास बनाने के बाद
देवलिया प्रतापगढ़ राज्य की आबादी बढ़ने लगी । फिर उक्त महारावत के
क्रमानुयायियों ने बागड़िया वैश्यों को कई प्रकार की रियायतें देकर कांठल
बुलवाकर वहां आबाद किया । धीरे-धीरे उन्होंने वहां व्यापार बढ़ाकर
बहुत कुछ उन्नति की । उनमें से कुछ ने अपनी कारगुज़ारी और सदा-
चरण से राज्य के विश्वसनीय पदों को प्राप्त किया । अमात्य-पद और
नरेश के अन्तःपुर के प्रबंध के अतिरिक्त राज्य का प्राचीन दफ़्तर भी हूंबड़
जाति के व्यक्तियों के अधिकार में ही रहा । वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी में,
जब कि कई पुराने राज्य बिगड़े, प्रतापगढ़ राज्य का अक्षुण्ण रहना वहां
के मंत्री और राजकर्मचारियों की योग्यता का ही परिणाम है । यही नहीं
उन्होंने इस राज्य को सुसमृद्ध बनाने का भी समय-समय पर प्रयत्न किया
और लोकोपकार की भावनाओं से प्रेरित होकर देवालय, बाग, बावड़ियां
आदि भी बनवाईं ।