राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल सम्बन्धी वर्णन ११
में मगरा ज़िले के लिए एक नायब नियत कर देवलिया में रखा गया और
वह ज़िला प्रतापगढ़ के अन्तर्गत कर दिया गया। फिर ख़ालसे की समस्त
भूमि का माली प्रबंध एक पृथक् अफ़सर बनाकर उसके अधीन कर दिया
गया, जो 'रेवेन्यु अफ़सर' कहलाता है। रेवेन्यु अफ़सर को जुडिशियल
मामलों में द्वितीय श्रेणी के मैजिस्ट्रेट के अधिकार प्राप्त हैं। कार्य की
सुविधा के लिए गांवों में पटवारो तथा क़ानूनगो मुक़र्रर कर दिये
गये हैं।
इस राज्य में पहले न्याय प्राचीन प्रणाली से होता था। फिर क्रमशः
उसमें वर्तमान शैली के अनुसार परिवर्त्तन किये गये । छोटे-छोटे दीवानी
न्याय मामलों के दो सौ रुपये तक के दावे सुनने का
अधिकार स्मॉल काज़ कोर्ट बनाकर उसे दे दिया
गया है, जिनकी अपील नहीं होती; परन्तु निगरानी हाई कोर्ट में होती है।
दो सौ रुपये से ऊपर दस हज़ार अथवा उससे अधिक के दावे अदालत
दीवानी में सुने जाते हैं और उनकी अपील सेशन जज के पास होती है।
सेशन जज के किये हुए फ़ैसलों की अपील हाई कोर्ट में होती है। फ़ौजदारी
मामले में एक हज़ार रुपया जुरमाना और दो वर्ष तक क़ैद की सज़ा देने का
अधिकार प्रथम श्रेणी के मैजिस्ट्रेट को है। उसकी अपील सेशन कोर्ट में
होती है। प्राण-दंड और देश-निर्वासन तक की सज़ा देने का अधिकार सेशन
जज को है। उसकी अपील हाई कोर्ट में होती है और महारावतजी साहब
की आज्ञा होने पर ही प्राण दंड और निर्वासन की सज़ा दी जाती है। ई०
स० १८४४ (वि० सं० १९५१) के इक़रारनामे के अनुसार धमोतर, राय-
पुर, कल्याणपुरा, भांतला, घरडिया, आंबीरामा, अचलावदा, अरनोद और
सालिमगढ़ के ठिकानों को दीवानी तथा फ़ौजदारी के नियत अधिकार प्राप्त
हैं। वि० सं० १६७७ ( ई० स० १६२० ) में महारावत रघुनाथसिंह ने बोड़ी
साखथली के ठाकुर को और वि० सं० १६८६ (ई० स० १६२६) में वर्तमान
महारावत सर रामसिंहजी ने जाजली के ठाकुर को भी नियत अधिकार
दे दिये हैं, जिससे इस समय न्याय सम्बन्धी अधिकारवाले वहां ११