राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिए गांवों में कई जगह शिक्षणालय खोले गये । राजधानी की पाठशाला
में अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा देने का भी आयोजन किया गया तथा पिन्हे
नोबल्स स्कूल का भी कार्य बढ़ाया जाकर उसके लिए छात्रावास बनाने
की व्यवस्था हुई । जनता में ज्ञान का विकास करने के लिए प्रतापगढ़ में
सरकारी बाग़ के भीतर कर्नल ए० टी० होम की स्मृति में 'होम लाइब्रेरी'
स्थापित की गई । स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी कार्यों में भी उस समय
समयानुसार उन्नति की गई एवं गमनागमन के मार्ग भी ठीक किये गये ।
पुलिस के महकमे का संगठन होकर उसमें होनेवाली ख़राबियों को रोका
गया और आय-व्यय का बजट प्रतिवर्ष बनाने का सिलसिला भी आरंभ
हुआ ।
वि० सं० १९६५ चैत्र सुदि ११ (ई० स० १९०८ ता० १२ अप्रेल) रविवार
को खेतड़ीवाली शेखावत कुंवराणी के उदर से महाराजकुमार के पुत्र राम-
सिंहजी का खेतड़ी में जन्म हुआ, जो प्रतापगढ़ के वर्तमान महारावत हैं ।
लगभग १०० वर्ष के पश्चात् प्रतापगढ़ राज्य में वहां के राजा के पौत्र उत्पन्न
होने के शुभ अवसर पर वहां की प्रजा फूली न समाई । महारावत और
महाराजकुमार ने इस अवसर पर अपनी स्वाभाविक उदारता में कमी न
की। फिर उसी वर्ष महाराजकुमार ने काश्मीर की यात्रा की, जहां के तत्का-
लीन नरेश महाराजा सर प्रतापसिंह ने उसका बड़ा सम्मान किया और
उससे उसकी कई मुलाक़ाते हुईं । तदनन्तर वह वहां की मनोहर छुटा
और दर्शनीय स्थानों का अवलोकन कर प्रतापगढ़ लौटा । इस यात्रा में
उक्त महाराजकुमार ने वहां दो शेरों का शिकार भी किया था ।
इसके एक वर्ष पीछे वि० सं० १९६६ ( ई० स० .१९०६ ) में महा-
रावत की दूसरी राजकुमारी राजकुंवरी का विवाह सैलाना ( मध्य भारत )
के स्वर्गीय राजा जसवन्तसिंह के ज्येष्ठ राजकुमार दिलीपसिंहजी ( वर्तमान
सैलाना नरेश ) के साथ बड़े समारोहपूर्वक हुआ । उस समय तक राज्य
ऋण-मुक्त नहीं हुआ था तो भी इस विवाह-कार्य में किसी प्रकार की त्रुटि
पैदा न हुई ।