राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
सायर के महक्मे की होता था । महारावत ने वि० सं० १९५१ ( ई० स०
स्थापना १८९४ ) से सायर की आय ठेके पर देना बन्द कर
दिया और एक अलग महक्मा स्थापित कर सायर
के महसूल का क्रम भी एकसा निर्धारित कर दिया ।
उसी वर्ष व्यापारी-वर्ग को सुविधा पहुंचाने के लिए महारावत ने
प्रतापगढ़ में तारघर और प्रतापगढ़ में पोस्ट ऑफ़िस खुलवाने के विषय में
देवलिया में डाकखाना अंग्रेज़ सरकार से लिखा-पढ़ीकर डाकखाने के
खुलना शामिल तारघर भी खुलवा दिया । इसके दूसरे वर्ष
( वि० सं० १९५२ में ) देवलिया में भी डाकख़ाना खोल दिया गया ।
गमनागमन के प्रायः सारे मार्ग कच्चे थे और सबसे नज़दीकी रेल्वे
स्टेशन मंदसोर राजधानी प्रतापगढ़ से २० मील दूर होने से जनता को वहां
पहुंचने में पूरी असुविधा होती थी । प्रतापगढ़ से
मंदसोर तक पक्की सड़क मंदसोर जाने के मार्ग की अधिकांश भूमि काली
बनना होने से वर्षा ऋतु में मार्ग दुर्गम हो जाता था। इस-
लिए महारावत ने अपने राज्य की सीमा में मंदसोर के मार्ग में पक्की सड़क
बनाने का विचार कर वि० सं० १९५१ ( ई० स० १८९४ ) में इस सड़क का
कार्यारम्भ करा दिया, जिससे १३ मील तक इस राज्य की सीमा में पक्की
सड़क बन गई और ७ मील तक अपनी सीमा में ग्वालियर राज्य ने सड़क
बनवा दी, जिससे प्रतापगढ़ से मंदसोर तक का मार्ग सरल हो गया ।
अपनी गद्दीनशीनी के एक वर्ष पीछे तक महारावत ने प्रतापगढ़ में
ही अपना निवास रखा। तत्पश्चात् उसने वहां की पुरानी राजधानी देवलिया
में अपना निवास रखना पसन्द किया; परन्तु देव-
देवलिया के राज-महलों लिया के राज-महल सब जीर्ण हो रहे थे । अतएव
का जीर्णोद्धार होना उसने उनके जीर्णोद्धार का कार्य कराया । ये महल
अब भी वहां की सौन्दर्य-वृद्धि कर रहे हैं। देवलिया-निवास के समय राजकीय
अदालतें प्रतापगढ़ में ही रहीं। राज्य-शासन में किसी प्रकार की अव्यवस्था
न हो, इस दृष्टि से वहां से प्रतापगढ़ तक टेलीफ़ोन लगा दिया गया ।