राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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महारावत उदयसिंह ३०१
इस मुल्क के लिए प्रचुर अनाज मंगवाने का प्रयत्न किया जावे । यह
आज्ञा दी जाती है कि तमाम जांगीरदार, अहलकार, पटेल, पटवारी आदि
निम्नलिखित बातों की तामील करें तथा जब तक ज़माना ठीक न हो,
यहां के निवासियों और बाहर के मनुष्यों को कष्ट न पहुंचावें—
( १ ) श्रावण सुदि १५ तक अनाज की निकासी तथा रवानगी पर
महसूल माफ़ किया जाता है ।
( २ ) जो परदेशी परिश्रम कर सकते हों वे इमारती कार्य में लगाये
जावें, जैसे कुएं खुदवाना, तालाब बनवाना आदि ताकि मुसीबत के समय
वे अपना निर्वाह कर सकें ।
( ३ ) प्रतापगढ़ में राज्य का एक और साहूकारों के कई
सदाव्रत हैं । उनके कार्य-कर्ताओं को सूचित किया जाता है कि मारवाड़ी
तथा अन्य लोग जो खैरात मांगें, उनको पूरे तौर से अर्थात् प्रत्येक आदमी
को सेर भर आटे से कम न दें ।
( ४ ) अनाज को राज्य में लाकर एकत्रित करने की रोक नहीं है,
तथापि इश्तिहार जारी किया जाता है कि अनाज के व्यापार पर किसी
प्रकार का प्रतिबंध न होगा । इस मुल्क के समस्त व्यापारी अनाज अपने
तौर पर ख़रीद कर बेचें । यही नहीं, उनको राज्य से सहायता भी दी
जायगी । यदि कोई परदेशी सौदागर प्रतापगढ़ इलाक़े में ग़ल्ला लाना चाहे
और रक्षा के लिए पहरा चाहे तो राज्य में सूचना करने पर पहरा मिल
जावेगा । मार्ग रक्षित नहीं है, जिससे इस अकाल के समय सावधानी और
निगरानी की आवश्यकता है ।
( ५ ) जो पशु मारवाड़ तथा अन्य स्थानों से आये हुए हैं, वे पहाड़
के नज़दीक कटे हुए घास के बीड़ में बिना महसूल चरेंगे । यदि कोई
शिकायत आवेगी कि किसी ने उनसे महसूल लिया है, तो महसूल लेने-
वालों को सज़ा दी जावेगी ।
( ६ ) रियासत के अहलकारों, जागीरदारों और मुत्सद्दियों को ज़रूरी
है कि इस विषय में एजेंट गवर्नर-जनरल, राजपूताना ने जो इश्तिहार भेजा