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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

२५८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
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पेशवा बाजीराव बल्लाल के समय से ही मालवा के इलाके पर मर-
हठों का आधिपत्य हो गया था । फिर बालाजी बाजीराव को उक्त सूबे पर
[होल्कर का प्रतापगढ़ राज्य से खिराज स्थिर करना] अधिकार रखने की बादशाह की तरफ़ से सनद
भी मिल गई, जिसपर उसने मालवा अपने सरदारों
में बांट दिया; परंतु इसके पूर्व ही पेशवा तथा
उसके सेनापतियों ने आतंक जमाकर मालवा तथा राजपूताने के राजाओं
से चौथ की वसूली का सिलसिला शुरू कर दिया था । प्रतापगढ़ राज्य
से चौथ की वसूली का स्वत्व होल्कर का रहा, किन्तु पेशवाओं के
साथ महारावत गोपालसिंह की मित्रता होने से उसपर चौथ की बावत
अधिक दबाव न पड़ा । विभिन्न ख्यातों के लेखों से पाया जाता है कि देव-
लिया प्रतापगढ़ राज्य की ओर से पहले शाही दरबार में पंद्रह हज़ार रुपये
वार्षिक खिराज के दिये जाते थे । बादशाहत की निर्बलता देख महा-
रावत ने वह होल्कर को देना स्वीकार कर लिया था; किंतु होल्कर ने
केवल पंद्रह हज़ार रुपये वार्षिक खिराज पर ही संतोष न किया और
संभवतः महारावत सामन्तसिंह के समय में दबाव डाल वार्षिक ७२७२०
रुपये सालिमशाही लेना स्थिर किया¹, जो अंग्रेज़ सरकार से संधि होने
के पूर्व तक वहां से होल्कर को मिलते रहे ।

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जागीर छोड़ देने का उल्लेख तो इसी प्रकार मिलता है, परन्तु उनमें महाराणा को तीन
लाख रुपये देने का वर्णन नहीं है । महाराणा भीमसिंह के समय अढ़ाड़ा कवि किशन
ने 'भीमविलास'-नामक काव्य की रचना की । उसमें इस घटना का निम्नलिखित
वर्णन है—
∙∙∙ऊपरि मुकाम तट महिय आय, घर बंसवार आतंक पाय ।
रावल विजेस करि मंत्र साम, कर जोध भेज त्रय लक्ख दाम ।
ताही मुकाम सामंत राव, भेजिय वकील महरान पाव ।
तिन सीस दंड मनमान थप्प, त्रय लक्ख दाम इक ठाम अप्प ।
छंडाय धरावद ग्राम लीन, रघुनाथ राव कहूं पटे दीन ∙∙∙॥२६॥
पृ० ११६ ।
( १ ) के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६६ । माल्कम की