राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
उधर से कुंवर सामन्तसिंह का जन्म हुआ । महारावत के अन्य कुंवर
रोड़सिंह, विजयसिंह, गजसिंह, महतावसिंह, लालसिंह तथा मयाकुंवरी और
रूपकुंवरी नामक दो कन्याएं हुई थीं। उनमें से रोड़सिंह से महतावसिंह तक
के चारों कुंवर बाल्य-काल में ही मृत्यु' को प्राप्त हुए और सामन्तसिंह
तथा लालसिंह' उस (सालिमसिंह) की मृत्यु के पीछे विद्यमान थे ।
उस (सालिमसिंह) के समय के निम्नलिखित शिलालेख और
ताम्रपत्र मिले हैं-
( १ ) वि० सं० १८१३ माघ सुदि १ ( ई०
[महारावत के समय के]
[शिलालेख, दानपत्र आदि] स० १७५७ ता० २० जनवरी ) की देवद और करा-
इ़ठा गांव की कुंवर दौलतसिंह ( कल्याणपुरा ) के
नाम की सनद, जिसमें सेवा के एवज़ देवद और कराइ़ठा गांव प्रदान
करने और बदले में एक हज़ार रुपये वार्षिक खिराज जमा कराने का
उल्लेख है ।
( २ ) वि० सं० १८१४ भाद्रपद सुदि १२ ( ई० स० १७५७ ता० २६
अगस्त ) का व्यास हरिराम, खीमराम, नाथूराम और भवानीशंकर के नाम
का ३० बीघा ज़मीन का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत का उपर्युक्त व्यक्तियों
को नीनोर गांव में ज़मीन देने का उल्लेख है ।
( ३ ) वि० सं० १८१५ श्रावण सुदि १ ( ई० स० १७५८ ता० ४ अग-
स्त ) की शाह सुंदर के नाम की सनद, जिसमें उसकी जागीर और मान-
झाबुआ राज्य के निकट एक राठोड़ राज्य था, जहां के स्वामी जोधपुर राज्य के स्वामी
मालदेव के ज्येष्ठ पुत्र राम के वंशधर थे । मुग़ल साम्राज्य की अवनति के समय आम-
झरा मरहटा-युद्ध का केन्द्र रहा और वहीं पर मालवा की रक्षार्थ मरहटी सेना से युद्ध
करते हुए मालवा के सूबेदार राजा गिरधरबहादुर और दयाबहादुर मारे गये थे । तद-
नन्तर उक्त राज्य सिंधिया का खिराजगुज़ार रहा और वि० सं० १६१४ ( ई० स०
१८५७ ) के सिपाही विद्रोह में वहां का स्वामी बख़्तावरसिंह बाग़ी दल से मिल गया ।
इसपर अंग्रेज़ सरकार ने उसको गिरफ़्तार कर इंदौर में फांसी का दंड दिया और उक्त
राज्य ज़ब्त कर सिंधिया ( ग्वालियर राज्य ) को दे दिया ।
( १ ) लालसिंह के वंशज अरण्योद के स्वामी हैं ।