राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
और उसकी बाण-विद्या की प्रशंसा की है, अतएव इस काव्य की रचना
के समय प्रतापसिंह के १०-१२ वर्ष का होने का अनुमान होता है ।
राजकुमार प्रतापसिंह के वि० सं० १७१६ ( ई० स० १६६२) में शाही
दरबार में जाने के संबंध के एक पत्र का ऊपर उल्लेख किया गया है । उस
समय उसकी आयु कम से कम २० वर्ष होनी चाहिये, इस अनुमान से
'हरिभूषण महाकाव्य' का रचना-काल वि० सं० १७१०-१७१२ ( ई० स०
१६५३-१६५५ ) के बीच हो सकता है¹ ।
हरिविजय नाटक- यह नाटक पंडित जयदेव ने महारावत हरिसिंह के
नाम पर देवलिया में रचा था और महारावत के सभासदों के अवलोकनार्थ
वहां इसका अभिनय भी हुआ था। इसमें कृष्ण-द्वारा रुक्मिणीहरण का प्रसङ्ग
है। इसका रचना-काल शक संवत् १५७६ (वि० सं० १७१४ = ई० स० १६५७)
का कार्तिक मास दिया है²। जयदेव तरवाड़ी-मेवाड़ा ब्राह्मण था और मेहता
उसकी उपाधि थी । उक्त महारावत ने उसको अपनी रचना में 'भूसुरसखा'
शब्द से संबोधन किया है । उसका उल्लेख पाटरया गांव के महारावत
( १ ) उद्यन्निर्मलमेदपाटविलसद्धंशैकचूडामणि
श्रीमन्माधवभट्टसूरितनयो दिक्कक्रविख्यातधीः ।
गङ्गाराममहाकविर्व्यवरचयत् काव्यं सुधासोदरं
तस्मिञ्छ्रीहरिभूषणे सुचरिते सर्गोह्यगादष्टमः ॥ ४३ ॥
सर्ग आठवां ।
( २ ) कविवरजयदेवदिव्यगुम्फे नृपहरिसिंहसमाजदर्शनीये ।
इति हरिविजयेऽस्तुसप्तमाङ्कोवितमहो हरिविश्वनाथतुष्टयै ॥
संसाराभयलिप्सुना गुणगृहं श्रीमन्महानाटकं
विद्वच्छ्रीजयदेवकेन नगरे श्रीदेवदुर्गे कृतम् ।
शाके नंदहयेषुचंद्रक्रमिते (१५७६) पक्षे सिते कार्तिके
संपूर्णा खलु रूपकं हरिगुणं भूयाद्धरीप्रीतये !