राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
(२) वि० स० १६८४ वैशाख सुदि ३ (ई० स० १६२७ ता० ८
अप्रेल ) का गयासपुर की चावंडी का शिलालेख, जिसमें महारावत सिंहा
के समय आभ्यन्तर वणजारा जाति के नायक गिरा-द्वारा उक्त बावड़ी के
बनवाये जाने का उल्लेख है १ ।
महारावत सिंहा नीतिमान राजा था और वह युद्ध की अपेक्षा मेल
को अधिक पसंद करता था । मेवाड़ और देवलिया राज्यों की सीमा मिली
हुई होने से समय-समय पर सीमा-संबंधी बखेड़े हो
महारावत का व्यक्तित्व
जाते थे; पर महारावत सिंहा ने बुद्धिमत्ता से कोई
झगड़ा बढ़ने न दिया और मेवाड़ के महाराणाओं से मेल रख अपने राज्य
की स्थिति सुदृढ़ की । उसके किसी युद्ध में भाग लेने के उदाहरण देखने
में नहीं आये । उसने बादशाह जहांगीर के कोप-भाजन सरदार महावतखां
को अपने यहां रखकर शरणागतवत्सलता का परिचय दिया । मुंहणोत
नैणसी की ख्यात से यह अधिक पाया जाता है कि उसने सोनगरे चौहानों
से ८४ गांव छीन लिये थे २ । उसने शाही दरबार से अपना संपर्क न
बढ़ाया । यदि वह अन्य राजपूत नरेशों की भांति शाही दरबार से सम्बन्ध
बढ़ाता, तो बहुत कुछ लाभ उठा सकता था ।
जसवंतसिंह
महारावत सिंहा का देहांत होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र जसवंतसिंह
वि० सं० १६८५ (ई० स० १६२८) के लगभग
राज्य-प्राप्ति
देवलिया-राज्य का स्वामी हुआ ३ ।
वा यो हरेत वसुंधरा षष्टी वर्ष सहस्राणी वीष्ठायां जायते करमी संवत् १६७६
वर्षे काती सुद ११ वार भोम दीने ...... ।
मूल ताम्रपत्र की छाप से।
(१) मूललेख के लिए देखो ऊपर पृ० १२३ टि० ४ ।
(२) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६३ ।
(३) महारावत जसवंतसिंह के नाम का एक ताम्रपत्र वि० सं० १६७३ वैशाख-