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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 534 में से

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[Header] महारावत भानुसिंह ११३

, को तेजसिंह का उत्तराधिकारी बतलाते हैं। स्वयं भानुसिंह के वि० सं०
१६५१ और १६५२ के ताम्रपत्र मिल चुके हैं। ऐसी अवस्था में गंगाराम
का यह कथन कि तेजसिंह के पीछे सिंहा देवलिया का स्वामी हुआ तथा
भानुसिंह, सिंहा का चाचा (तेजसिंह का भाई) था और वह सिंहा की
तरफ़ से जोधसिंह से युद्ध करने गया, स्वीकार करने योग्य नहीं है।
नैणसी की ख्यात में, जो प्राचीनता की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है,
क्वापि बुम्बारवाः पेतुः क्वापि भीममहारवाः ।
करिणां गर्जितं क्वापि क्वापि ढक्काघनस्वनाः ॥ १३ ॥
इति घोरे रणे जाते योधशक्तावतः स्वयम् ।
युयोध भानुना वीरः सानुमानिव चञ्चलः ॥ १४ ॥
युध्यमानान् रणे दृष्ट्वा पातयामास तद्भटान् ।
मृगानां कुलमासाद्य समन्युरिव केसरी ॥ १५ ॥***
युध्यमानं रणे भानुं दृष्ट्वा योधः समागतः ।
परस्परमभूद् युद्धं दारुणं वीरयोस्तयोः ॥ २३ ॥
आदौबाणैस्ततः प्रासैरासिभिस्तदनन्तरम् ।
पश्चात् कटारकैर्युद्धं तयोरिव तयोरभूत ॥ २४ ॥
तच्छत्रं भानुना बाणैश्छिन्नं योधोऽपितद्ध्वजम् ।
उभौ चिच्छिदतुः सद्यः सस्वनं धनुषोर्गुणम् ॥ २५ ॥***
खड्गमाकृष्य चिच्छेद प्रासं भानुकरस्थितम् ।
सोऽपि खङ्गक्षतं तस्यायुपवीतोचितं ददौ ॥ २७ ॥
पश्चात्कटारिकाघातैः पातितः समराङ्गणे ।
योधशक्तावतो वीरो गतासुरगताभिधः ॥ २८ ॥
माखनः खनिमापन्नः शक्त्या योधेन संहतः ।
राहूरिव पपातोर्व्यां कृष्णेनेव पुरा रणे ॥ २६ ॥
सप्तम सर्ग ।

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