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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 932, कुल 984 में से

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पृष्ठ 932

परिशिष्ट 'घ'
दरद
( तरंग १ : ३१२ पृष्ठ १२८, ३२२ )
पुराणों में उल्लेख आता है :
काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा ह्यङ्गलोकिकाः ।
चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुला बाह्यतोदराः ।। ( वामन० पु० १३.५० )
× × ×
दरदांश्च स काश्मीरान् गान्धारान् भौरसान् कुहून् ।
मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराणों में 'काम्बोजा दरदाश्चैव' एक साथ प्रयुक्त किया गया
है। कृष्णगंगा के ऊर्ध्वभागीय उपत्यका के उत्तरीय कश्मीर में दरदों का स्थान है। उसे आज भी दर-
दिस्तान कहते हैं। दरदापुर किंवा दरतपुरी वहाँ का नगर है। दरद क्षेत्र को दरस भी कहते हैं ( वायु०
: ४५ : ११ ९, मत्स्य १२१ : ४६ विष्णुधर्मोत्तर १ : १० : ९, मार्कण्डेय ५७ : ४० ) वायु तथा ब्रह्माण्ड
पुराण में 'दरदांश्च सकाश्मीरान्', वायु पुराण में 'दरदांश्च सकाश्मीरान', 'मत्स्य पुराण में', 'दरदोर्ज-
गुडाश्चैव' का उल्लेख मिलता है। स्पष्ट है कि दर्दिस्तान को कश्मीर के साथ रखा गया है। कुबेर का
स्थान सुमेरु पर्वत है । वर्तमान पामीर है । दरद देश पामीर के दक्षिण में है। दर्दुर पर्वत का उल्लेख सभा
पर्व ( १० : ३२ ) में आया है। उसके अधिष्ठाता कौरवों की सभा में रहते थे। प्रायः दरद जाति का
उल्लेख पिशाच, पुण्ड्र, तंगण, परितंगण, बाहिक आदि के साथ मिलता है। दारदिक तथा पैशाची भाषा को
आर्य भाषा की एक शाखा माना गया है। एक मत है कि वह ईरानी तथा भारतीय भाषा के मध्य की
भाषा थी । ( ग्रीयर्सन पैशाच आफ नार्थ बेस्ट द्रविड ३ )
जातकों में दद्दुर पर्वत का उल्लेख मिलता है। इसे हिमालय के अन्तर्गत माना गया है। मार्कण्डेय
पुराण में वर्णित दर्दुर पर्वत यही दद्दुर पर्वत है। यूनानी इतिहासकारों ने दरदाई जाति का वर्णन किया है।
यह जाति दद्दुर पर्वत माला में निवास करती थी। कश्मीर उपत्यका के उत्तर में स्थित है। चेतिय जातक
की गाथा है। दद्दरपुर के उपचर के पाँचों पुत्रों ने पाँच नगर हत्थिपुर ( हस्तिनापुर ) अस्सपुर (अंग में )
सीहपुर ( लालराष्ट्र उत्तरीय पंजाब ) उत्तर पंचाल ( सम्भवतः अहिच्छत्र ) तथा दद्दरपुर बसाया था ।
दद्दरपुर नाम रखने का कारण दिया गया है। वहाँ दो पर्वतों के मध्य रगड़ द्वारा दद्दर ध्वनियां उठती
रहती थीं। मनुस्मृति में मनु ने ( १० : ४४ ) दरद जाति का उल्लेख किया है।
हरिवंश पुराण में वर्णन है—कश्मीर राज गोनर्द के साथ दरद राज ने भी जरासंध का पक्ष लेकर
कृष्ण के विरुद्ध मथुरा में युद्ध किया था ।
अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान् ।
दक्षिणं शैलनिचयं दारयिष्यामि देशितः ॥
हरिवंश विष्णु पर्व ४२ : ३७