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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 984 में से

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पृष्ठ 92

प्रथम तरङ्ग १५
द्वापञ्चाशतमाम्नायभ्रंशद्यान् नास्मरन् नृपान् ।
तेभ्यो नीलमताद् दृष्टं गोनन्दादिचतुष्टयम् ॥ १६ ॥
१६ पूर्व रचनाकारों को वावन राजाओं के इतिवृत्त का प्रमाणों के अभाव मे अज्ञान था ।
उनमें से गोनंदादि चार राजाओं का वर्णन नीलमत पुराण से लिया गया है।
अपनी पैनी दृष्टि के साथ ही साथ, परिश्रम से सामग्री (३) यशोवती, तथा (४) गोनंद द्वितीय है।
एकत्रित कर, इस ऐतिहासिक महाकाव्य की रचना नीलमत ६-९।
में हाथ लगाया था।
कीर्ति स्तंभ-विजय स्तंभ- कल्हण न
इस तरंग की श्लोक-संख्या १६ तथा ४५
कश्मीर में कीर्ति-स्तंभ का उल्लेख नहीं किया है।
में कल्हण ने स्पष्ट कहा है। पूर्ववर्ती ५२
मन्दिर, धर्मशाला, विहार, तड़ाग, वापी, चैत्य, मठादि
राजाओं के इतिहास का किसी समय अस्तित्व
के शिलालेखों में राजाओं तथा महान् व्यक्तियों किंवा
था। काश्मीर में वे ग्रंथ थे। परन्तु उनका लोप
निर्माणकर्त्ताओं की कीर्ति के पद लिखे जाते हैं।
हो गया है। कल्हण ने उन्हें खोजने का यथा-
शक्ति प्रयास किया ।
राजा लोग विजय, राज्यारोहण, यश,
किसी विशेष घटना के स्मरणार्थ कीर्ति-स्तंभों
का निर्माण कराते हैं। मिस्र, बेबीलोन, असीरिया तथा
काश्मीर का इतिहास क्रमबद्ध तिथियों तथा
वर्षों तक में वर्णित किया गया है। कल्हण से सहस्रों
ईरान के प्राचीन राजाओं ने अपनी कीर्तियों को
वर्ष पूर्व लुप्त राजाओ का काल आता है। सामग्री
स्तंभों पर खुदवाया था। भारत के गुप्त सम्राटों
अप्राप्य देखकर कल्हण ने कारण भी उपस्थित किया
ने यह प्रथा चलाई थी। अशोक के स्तंभ कीर्ति स्तंभ
है। उन ग्रन्थों के लोप होने का क्या कारण था ?
न होकर प्रचारार्थ धर्म स्तंभ कहे जायेंगे । चन्द्रगुप्त,
उनको जब कोई उपयोगिता नही रह गई तो
समुद्रगुप्त, स्कन्दगुप्त आदि राजाओं ने इस प्रकार के
उन्हें कौन पढ़ेगा ? अफगानिस्तान तथा भारत
स्तंभ का निर्माण कराया था। मन्दसौर तथा महरौली
के पश्चिम उत्तर सीमांत में वेदों तथा संस्कृत
(दिल्ली) के कीर्ति स्तंभ इसके ज्वलन्त उदाहरण
ग्रन्थों की रचना हुई थी। वहाँ के लोग मुसलमान
हैं। कल्हण ने संभव है, इस प्रकार के अभिलेखों को,
हो गए। अतएव पुरातन वैदिक साहित्य तथा
प्रशस्ति-पट्ट वर्ग में रखा हो। कीर्ति और विजय स्तम्भ
संस्कृत ग्रन्थों की उपयोगिता नष्ट हो गई। वे
में अन्तर है। विजय स्तम्भ किसी विजय के उपलक्ष्य
लुप्त हो गए, उनके स्थान पर अरबी, फारसी
में लगाया जाता था। प्रत्येक विजय स्तम्भ कीर्ति
तथा नवीन लिपी आई। इसका अर्थ यह नहीं
स्तम्भ होता है। परन्तु प्रत्येक कीर्ति स्तम्भ का विजय
है। आज से १५ सौ वर्ष पूर्व अफगानिस्तान
स्तम्भ होना सम्भव नहीं है।
आदि में संस्कृत तथा वैदिक साहित्य का अस्तित्व
नही था। यह प्रकृति का गुण है। जिन वस्तुओं
पाठभेद :
की उपयोगिता नष्ट हो जाती है उन्हें त्याग दिया
श्लोक संख्या १६ में 'गोनन्दादि' का पाठभेद
जाता है। शरीर भी जब क्षीण, रोग-ग्रस्त ओर
'गोनर्दादि' मिलता है।
जर्जर हो जाता है तो आत्मा भी इसका साथ त्याग
पादटिप्पणियाँ :
देती है।
१६ (१) चार राजा- (१) गोनंद, (२) दामोदर,