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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 984 में से

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पृष्ठ 89

१२ राजतरङ्गिणी
दृष्टैश्च पूर्वभूपर्तृ प्रतिष्ठावस्तुशासनैः ।
प्रशस्तिपट्टैः शास्त्रैश्च शान्तोऽशेषभ्रमक्लमः ॥ १५ ॥
१५ पूर्व काल के भूपतियों द्वारा मंदिरों के प्रतिष्ठाकालीन एवं दान संबंधी प्रतिष्ठा¹ तथा
वस्तु² प्रशस्तिपट्टों³ और शास्त्रों⁴ के अवलोकन द्वारा जो कुछ भ्रम मुझमे शेष रह गया
था उसकी भी शांति हो गई है।

था । प्रथम यह कि पुरा काल में काश्मीर विशाल
सरोवर अर्थात् सतीसर था । जल बह जाने के कारण
रमणीय भूमिमय उपत्यका बन गयी थी । नाग जाति
यहाँ की संरक्षक थी । जल बह जाने पर सरोवर
काश्मीर राज्य के रूप में परिणत हो गया । उस
समय भी नाग जाति वहाँ पर थी ।
हुएनसांग मिहिर कुल का वर्णन करता है।
वह काश्मीर का राजा था । घोर अत्याचारी था ।
बौद्ध धर्मानुयायियो का शत्रु था । उसे लोगो के
हत्या की कुप्रवृत्ति प्राप्त थी । वह बाल अवला वृद्ध
सबको ताड़ित करना था ।
राजतरंगिणी में कल्हण ने पहली घटना का वर्णन
१. २४-३१ में किया । दूसरी घटना-मिहिर कुल के
शासन और उसके नृशस प्रवृत्तियो-का वर्णन
( तरग १ के २८६-३२५ ) मिलता है । मिहिर कुल
के राज्यकाल के सदभं मे इस विषय पर और प्रकाश
डाला गया है ।
काश्मीर में मुसलिम शासन हो जाने पर भी
नीलमत पुराण की मान्यता थी । मुसलिम बादशाह
नीलमत पुराण का आदर करते थे । नीलमत पुराण
की प्राचीनता तथा उसके अस्तित्व का समर्थन श्री जोन
राज द्वितीय राजतरंगिणी में करते हैं । श्री जोनराज
के समय में नीलमत पुराण का पाठ होता था ।
काश्मीर के प्रसिद्ध बादशाह बडशाह जैनुल आ-
वदीन (सन् १४२०-१४७० ई० ) पण्डितों से
नीलमत पुराण सुनता था । उसके आधार पर उसने
एक नवीन सिद्धान्त का प्रतिपादन जगत् में किया
था । (दन १९ )

पाद टिप्पणियाँ :
१५. ( १ : प्रतिष्ठाशासन—इस शब्द का प्रयोग
कल्हण ने उन शिलालेखों के लिये किया है जो
मंदिरों, मठों, विहारो, देवस्थानों, स्मारकों, प्रतिमाओ,
के पीठस्थानों, सिहासनो, राजप्रासादो, भवनों पर,
स्मृति तथा परिचय निमित्त उत्कीर्ण किये जाते थे ।
मन्दिरो तथा मूर्तियो के प्रतिष्ठा के समय 'शिला
लेखादि लगाने की प्रथा आज भी प्रचलित है।
राजाओ के राज्याभिषेक के समय शासन प्रसारित
किये जाते थे, जैसे—बंदियो की कारागार से मुक्ति,
करों की छूट, बलि के लिये पशुहत्या पर प्रतिबन्ध ।
राजा अपने शासन काल में किस नीति का अवलंबन
करेगा, कितने दोषपूर्ण राजनियम अप्रचलित किये
जायेंगे, कौन से सुधार एवं संशोधन प्रचलित राज
नियमो में किये जायेंगे आदि । राजाओं के राज्या-
भिषेक के अवसर पर कुछ प्रतिष्ठा शासन प्रसारित
किये जाते थे । कितने दोषपूर्ण राजनियम अप्रचलित
किये जायेंगे, कितने प्रचलित राज नियमो में
संशोधन, परिवर्धन, किये जायेंगे, इसकी तालिका
प्रतिष्ठा शासन में होती थी । राज्याभिषेक उत्सव के
उपलक्ष में मंदिरो, व्यक्तियो, विहारो, मठो को क्या
दान दिया जायेगा, इत्यादि बातें प्रतिष्ठा शासन में
आती थी । यह प्रथा आज भी प्रचलित है।
इस प्रकार की सामग्रियां काश्मीर में आज भी गडिन
बिखरी पड़ी हैं । मुस्लिम शासन काल में सभी मंदिर,
देवस्थान, आदि तोड दिये गये थे । उनके पत्थर
मस्जिदो, मजारों, ज़ियाग्तों तथा मकानों में लग गये हैं।
कल्हण के पूर्व हुई, रानी दिद्दा का एक शिलालेख
मिला है। यह लाहोर के संग्रहालय में सुरक्षित है।