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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 984 में से

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पृष्ठ 53

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अधिनायक नही था । वह प्रजा के लिए पिता तुल्य था । ( रा० ५ : ३५० ) साधारण व्यक्तियों के समान
राजा भी मानवीय दुर्बलताओं का सरलतापूर्वक शिकार हो जाता था । ( रा० ८ : १५५२ ) राज्य के
आध्यात्मिक सिद्धान्तो का प्रतिपादन करते हुये कल्हण बलवती भाषा मे कहता है अन्यायी राजा कष्ट पाता
है । ( रा० ७ : १५८२; ८ : १९५१ ) दुष्ट राजा को उसकी जीवन काल ही में दुर्गति होती है । राजा
को कल्हण प्रजा से सर्वथा भिन्न नही मानता । राजा एवं प्रजा दोनो एक ही शरीर के पुरजे हैं । एक
शरीर तुल्य है । उसने यहाँ पर यूनान के नगर राज्यों के दर्शन तुल्य विचार किया है । कल्हण ने
राजा को दार्शनिक ढंग से केवल प्रजा से ही नहीं प्राणिमात्र से मिला दिया है । ( रा० : २४६-२६६,
३ : ८१-२, ५० ) कल्हण कहता है—'जो प्रजा पीड़क राजा होते हैं वे कुल सहित नष्ट हो जाते हैं । और
जो नष्ट राज्य को सुव्यवस्थित करते हैं उनके वंश की अनुगामिनी श्री होती है ।' ( रा० १ : १८८ )
पुरोहित एवं द्विज परिषद : कल्हण दो परिषदों का उल्लेख करता है । द्विज परिषद का प्रथम
उल्लेख राजा लव के सन्दर्भ में किया है । ( रा० १ : ८७ ) मन्दिरों पर चढ़ायी देवोत्तर सम्पत्ति, अग्रहार,
ग्राम तथा अन्य दान कालान्तर में परिषद को मिल जाते थे ( रा० २ : १३२ )
राजा का चयन परिषद करती थी । उत्पल वंश का जब अन्त हो गया तो ब्राह्मण एकत्रित हुए ।
राजा चुनने का उसने निश्चय किया । कमलवर्धन के कहने पर द्विज-मण्डली एकत्रित हुई थी । कमलवर्धन
स्वयं राजा बनना चाहता था । द्विज गण कुछ निश्चय न कर सके । इसी समय पुरोहित परिषद ने यशस्कर
को राजा घोषित कर दिया । ( रा० ५ : ४५६-४६६ )
इसी प्रकार ब्राह्मण सभासदों ने तुंग के पतन हेतु ब्राह्मण तथा पुरोहित परिषद् को प्रेरित किया ।
कि वे परिहास पुर मे प्रायोपवेशन आरम्भ करें । ( रा० ७ : १३) कालान्तर में परिषदों का रूप बदल गया
था । ब्राह्मण लोग परिषद् तथा प्रायोपवेशन को साधन बनाकर अर्थ सिद्धि करने लगे । ( रा० ७ : १४,
२३ ) भीम केशव का मन्दिर बहुत दिनों तक परिषद् के सदस्यों के पारस्परिक संघर्ष के कारण बन्द रहा ।
(रा० ७ : १०८२) पुरोहित परिषद् ने इसी प्रकार प्रायोपवेशन को साधन बनाकर राजा हर्ष को उन्हें
रुढ भारोठी से मुक्त करने लिए बाध्य कर दिया । (रा० : ७, १०८८) इसी प्रकार राजा सुस्सल के समय
पुरोहित परिषद् प्रायोपवेशन किये थे । (रा० ८, ७०९) राजा भिक्षाचर के समय में भी पुरोहित परिषद् ने
इसी प्रकार प्रायोपवेशन द्वारा अपनी बातें मनवायी थी ।
पुरोहित एवं द्विज परिषद् चार हजार वर्षों तक राजा लव के समय से कल्हण काल तक दिखायी
देती है । विश्व की यह सबसे पुरानी, जागरूक एवं शक्ति सम्पन्न संस्था थी ।
कल्हण को अपने ब्राह्मणत्व एवं अभिजात कुलोत्पन्न होने का गर्व था तथापि उसने पुरोहित तथा
परिषद् के अनुचित व्यवहारों की निन्दा की है। राजा तथा राज्य की स्थिति संकटापन्न होती थी, तो ऐसा
ही समय प्रायोपवेशन के लिए अधिक से अधिक उपयुक्त समझा जाता था । प्रायोपवेशन पुरातन काल में एक
नैतिक अस्त्र था। दुर्बल सबलों के विरुद्ध उसका प्रयोग करते थे। किन्तु काश्मीर में द्विजों ने उसे उपहासास्पद
बना दिया था। राजनीति स्वार्थ सिद्धि एवं धन ऐंठने का साधन हो गयी थी। प्रायोपवेशन का इतना दुरुपयोग
होने लगा था कि राज्य ने एक प्रायोपवेशन अधिकारी नियुक्त किया था । (रा० ६ : १४) राजा चन्द्रापीड ने
स्वयं मार्गदर्शन के लिए मन्दिर में प्रायोपवेशन किया था । (रा० ४ : ९९) कल्हण ने पुरोहित परिषद् तथा
पुरोहितो की खूब खिल्ली उड़ाई है । उनके इस कार्य को कायरता माना है। (रा० ४:८२, ९९; ५:४६८,