सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 410

तथा गोपी चन्दन से लगवाते है। अनेक भक्त
उनका गुदना गुदवा लेते हैं।
पैर का चिन्ह वस्त्र पर छपवाने का कोई
तुक नहीं मालूम होता। वह मनुष्य पादांकित
वस्तु अपवित्र मानी जायगी। यह सम्भव नही था
कि तत्कालीन हिन्दू किंवा बौद्ध जनता पादांकित
वस्त्र अपनो महिलाओं से हृदय पर धारण करवाती।
मै समझता हूँ। सिंहल भगवान् के पद
चिन्ह के कारण तीर्थ था। उसे देखने तथा
पूजा करने के लिए हिन्दू तथा बौद्ध दोनों जाते
थे। भगवान् का पद पवित्र था। अतएव
उसे वस्त्र पर स्वर्ण सूत्र अर्थात् जरी से अंकित
कर दिया जाता था। उसी प्रकार शिव विष्ण
के शंख, चक्र, गदा, पद्म, त्रिशूल वस्त्रों, उत्तरीय
आदि पर अंकित कर दिये जाते हैं। सिंहल का
यही पादांकित वस्त्र कश्मीर मे आया रहा होगा।
किन्तु कल्हण यहाँ 'राजा' शब्द पादांकित के
लिए प्रयोग करता है। उसका स्पष्ट अर्थ राजा
का पद है। यहाँ पर दो बातें सम्भव हो सकती
हैं। मिहिरकुल बौद्ध धर्म विरोधी था। वह शिव
भक्त था। उसने यदि जाना होगा कि उसको
हृदयेश्वरी हृदय पर बुद्ध पादांकित वस्त्र पति के
शिव भक्त होते हुए भी धारणा करती है, तो वह
क्रोधित हो उठा होगा। वह सिंहल राज के इस
धर्म प्रचार को बुरा मानकर उसे दण्ड देने के
अपने उप स्वभावानुकूल अभियान किया होगा।
सिंहलराज के पादांकित वस्त्र विक्रय करने का
कुछ अर्थ समझ में नही आता। उसने भगवान् का
पादांकित वस्त्र सिंहल के गौरव स्वरूप बेचने का
प्रयास किया।
मिहिरकुल ने पादांकित वस्त्र के स्थान
पर यमुपदेव वस्त्र लाया। कल्हण ने
उल्लेख किया है। सूर्य की उपासना आर्य
धर्मावलम्बी करते है। सूर्य की उपासना का
स्थान बौद्ध धर्म में नहीं है। यमुपदेव वस्त्र भी
सिंहल में तैयार होता था। हिन्दू धर्म का प्रतीक
सूर्य तथा बुद्ध का प्रतीक चरण दोनों से अंकित
वस्त्र बनते थे।
गया में चरण पादुका पर पूजा होती है।
दिल्ली में कुतुब मीनार स्थान का नाम विष्णु पद
पर्वत था। मन्दिर विष्णु का था। हिन्दुओं में
पादुका पूजा एवं चरण पूजा का विशेष महत्त्व है।
प्रत्येक मन्दिर में चरणपादुका पत्थर पर बनी
होती है। उस पर पुष्प, दक्षिणादि चढ़ाया जाता
है। बौद्धों में भी हिन्दुओं की देखादेखी चरण
पूजा आरम्भ हो गयी थी। बौद्ध मन्दिर में भी
चरण पादुका रखी जाने लगी।
राजा मिहिरकुल ने बौद्धों के इस प्रचार प्रकार
को, हंसपादांकित वस्त्र के स्थान पर अपने अभि-
यान के फलस्वरूप यमुपदेव हिन्दुओं के प्रतीक
चिन्ह को मान्यता दिया। सिंहल राजा पादांकित
वस्त्र की यह कल्पना सर्वथा ठीक नही उतरती। वे
पद के तीर्थ तथा पद की पवित्रता के महत्त्व को
भूल गये होंगे।
कल्हण यहाँ कंचुकी के मुख से कहलाता है
कि सिंहल राज के पद का अंकित वस्त्र था।
कंचुकी का अन्तःपुर में स्थान एक पार्षद का था।
वह वृद्ध रूप में सर्वदा एवं सर्वत्र चित्रित किया
है। यह नारद का भी कार्य करता चित्रित किया
गया। राजा के क्रोध को देखकर परिणाम किया
राजा की चाटुकारिता के लिये 'पद' देख कर दो
राजाओं में लड़ाई हो जाय, कटुता बढ़े इस प्रयो-
जन से सिंहलराज का नाम ले लिया होगा।
सिंहल का वह वस्त्र था। यह सब जानते थे।
सब प्रयोग करते थे। किसी ने पद की ओर ध्यान
भी नहीं दिया होगा। यदि कभी किसी ने जिज्ञासा
की ना होगी तो सिंहल के व्यापारी भगवान्
का पद है यह दिये होंगे।
कंचुकी को तुरन्त उत्तर देना था। परिहास
एवं विदूषकता के कारण सिंहल के राजा के वस्त्र