राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३०१
तथा गोपी चन्दन से लगवाते हैं । अनेक भक्त
उनका गुदना गुदवा लेते हैं।
पैर का चिन्ह वस्त्र पर छपवाने का कोई
तुक नहीं मालूम होता । वह मनुष्य पादांकित
वस्तु अपवित्र मानी जायगी । यह सम्भव नहीं था
कि तत्कालीन हिन्दू किंवा बौद्ध जनता पादांकित
वस्त्र अपनी महिलाओं से हृदय पर धारण करवाती ।
मै समझता हूं। सिंहल भगवान् के पद
चिन्ह के कारण तीर्थ था । उसे देखने तथा
पूजा करने के लिए हिन्दू तथा बौद्ध दोनों जाते
थे । भगवान् का पद पवित्र था । अतएव
उसे वस्त्र पर स्वर्ण सूत्र अर्थात् जरी से अंकित
कर दिया जाता था । उसी प्रकार शिव विष्णु
के शंख, चक्र, गदा, पद्म, त्रिशूल वस्त्रो, उत्तरीय
आदि पर अंकित कर दिये जाते है । सिंहल का
यही पादांकित वस्त्र कश्मीर में आया रहा होगा ।
किन्तु कल्हण यहां 'राजा' शब्द पादांकित के
लिए प्रयोग करता है। उसका स्पष्ट अर्थ राजा
का पद है। यहां पर दो बातें सम्भव हो सकती
हैं । मिहिरकुल बौद्ध धर्म विरोधी था । वह शिव
भक्त था । उसने यदि जाना होगा कि उसकी
हृदयेश्वरी हृदय पर बुद्ध पादांकित वस्त्र पति के
शिव भक्त होते हुए भी धारणा करती है, तो वह
क्रोधित हो उठा होगा। वह सिंहल राज के इस
धर्म प्रचार को बुरा मानकर उसे दण्ड देने के
.. उस स्वभावानुकूल अभियान किया होगा ।
... राज के पादांकित वस्त्र विक्रय करने का
... समझ में नहीं आता। उसने भगवान् का
वस्त्र सिंहल के गौरव स्वरूप बेचने का
ने पादांकित वस्त्र के स्थान
वस्त्र लाया । कल्हण ने
। सूर्य की उपासना आर्य
। सूर्य की उपासना का
। यमुपदेव वस्त्र भी
सिंहल में तैयार होता था। हिन्दू धर्म का प्रतीक
सूर्य तथा बुद्ध का प्रतीक चरण दोनों से अंकित
वस्त्र बनते थे ।
गया में चरण पादुका पर पूजा होती है ।
दिल्ली में कुतुब मीनार स्थान का नाम विष्णु पद
पर्वत था । मन्दिर विष्णु का था । हिन्दुओं में
पादुका पूजा एवं चरण पूजा का विशेष महत्त्व है ।
प्रत्येक मन्दिर में चरणपादुका पत्थर पर बनी
होती है । उस पर पुष्प, दक्षिणादि चढाया जाता
है। बौद्धों में भी हिन्दुओं की देखादेखी चरण
पूजा प्रारम्भ हो गयी थी । बौद्ध मन्दिर में भी
चरण पादुका रखी जाने लगी ।
राजा मिहिरकुल ने बौद्धो के इस प्रचार प्रकार
को, हैंमपादांकित वस्त्र के स्थान पर अपने अभि-
यान के फलस्वरूप यमुपदेव हिन्दुओं के प्रतीक
चिन्ह को मान्यता दिया । सिंहल राजा पादांकित
वस्त्र की यह कल्पना सर्वथा ठीक नही उतरती । वे
पद के शौर्य तथा पद की पवित्रता के महत्त्व को
भूल गये होगे ।
कल्हण यहां कंचुकी के मुख से कहलाता है
कि सिंहल राज के पद का अंकित वस्त्र था ।
कंचुकी का अन्तःपुर में स्थान एक पार्षद का था ।
वह वृद्ध रूप में सर्वदा एवं सर्वत्र चित्रित किया
है । वह नारद का भी कार्य करता चित्रित किया
गया । राजा के क्रोध को देखकर परिहास किंवा
राजा की चाटुकारिता के लिये 'पद' देख कर दो
राजाओं में लडाई हो जाय, कटुता बडे इस प्रयो-
जन से सिंहलराज का नाम ले लिया होगा ।
सिंहल का वह वस्त्र था । यह सब जानते थे ।
सब प्रयोग करते थे । किसी ने पद की ओर ध्यान
भी नहीं दिया होगा । यदि कभी किसी ने जिज्ञासा
की भी होगी तो सिंहल के व्यापारी भगवान्
का पद है कह दिये होंगे ।
कंचुकी को तुरन्त उत्तर देना था । परिहास
एवं पिशुनता के कारण सिंहल के राजा के वस्त्र