राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३६०
दक्षिणां सान्तक्रामाशां स्पर्धया जेतुमुद्यता ।
यन्निषादुत्तरहरिद्विभारान्यमिवान्तकम् ॥ २६० ॥
२९०. उत्तर १ दिशा ने, दक्षिण दिशा २ पर विजय प्राप्त करने के लिए दक्षिण के देवता काल
की स्पर्धा में मिहिरकुल को यमराज तुल्य उपस्थित किया ।
सान्निध्यं यस्य सैन्यान्तर्हन्यमानाशनोत्सुकान् ।
अजानन्गृध्रकाकादीन्दृष्ट्वाऽग्रे धावतो जनाः ॥ २९१ ॥
२९१. राजा के समीप आने की सूचना लोग उसकी सेना द्वारा मारे जाने वालों के मांस
उत्सुक गृध्र, काकादि पक्षियों को उसके आगमन के पूर्व मँडराते हुए देखकर पा जाते थे ।
दिवारात्र हतप्राणिसहस्रपरिवारितः ।
योऽभूद् भूपालवेतालो विलासभवनेष्वपि ॥ २९२ ॥
२९२. रात दिन सहस्रों हत प्राणियों से परावृत वह भूपाल अपने विलासभवन में भी
वेताल १ था ।
बालेषु करुणा स्त्रीषु घृणा वृद्धेषु गौरवम् ।
न बभूव नृशंसस्य यस्य घोराकृतेर्ध्नतः ॥ २९३ ॥
२९३. घोर आकृति, नृशंस और मानव द्रोही इस राजा में बालकों के प्रति करुणा, स्त्रियों
के प्रति घृणा तथा वृद्धों के प्रति गौरव भाव नहीं था ।
( १ ) उत्तर दिशा : चारों दिशाओं के चार
दिक्पाल किंवा देवता है । इन्द्र पूर्व दिशा, वरुण
पश्चिम दिशा, कुबेर उत्तर दिशा तथा यम दक्षिण
दिशा के देवता हैं। कुबेर धन के स्वामी हैं। उनके
कारण लक्ष्मी प्राप्त होती है । वे पालक हैं । सम्पत्ति
प्रदायक है । नाशक नहीं है । विष्णु भी रक्षक हैं ।
विष्णु मन्दिर का मुख इस लिये उत्तर तथा पूर्व
दिशा रखा जाता है । उत्तर जिस प्रकार दक्षिण
दिशा के ठीक विरोधी दिशा में है । उसी प्रकार
दोनों दिशाओं के देवता तथा कर्म भी परस्पर विरोधी
हैं । कल्हण इसी ओर संकेत करता है । उत्तर दिशा
ने दक्षिण दिशा पर विजय प्राप्ति निमित्त दक्षिण
दिशा के संहारक यम तुल्य मिहिरकुल स्वरूप यम-
राज उत्पन्न किया था ।
( २ ) दक्षिण दिशा : मृत्यु की दिशा है ।
उसका देवता यम है । शिव संहार के देवता है ।
अतएव शिव मन्दिर का द्वार दक्षिण तथा पश्चिम
होता है । पश्चिम में सन्ध्या जन्म लेती है । व
जीवन सन्ध्या की दिशा है । वहाँ अन्धकार उत्पन्न
होता है । पूर्व दिशा उदय की दिशा है । वहाँ से
सूर्य ज्योति अन्धकार को तिरोहित करती उठती है ।
और पश्चिम में जाकर लुप्त हो जाती है । उत्तर तथा
पूर्व दिशा की ओर मुख कर उत्तम तथा पवित्र कार्य
किये जाते हैं । मृत्यु के पश्चात् मनुष्यों का पद
दक्षिण दिशा की ओर कर दिया जाता है । मुसलमान
भी अपने शव का पद दक्षिण की ओर करके
गाड़ते हैं ।
२९२ ( १ ) वेताल : पिशाचों का एक समूह
वेताल कहा जाता है । रुद्र गणों में वेताल सम्मिलित
है । रणभूमि में उपस्थित रहते हैं । वहाँ के मानव
रक्त एवं मांस भक्षण करते हैं । ( भा०२:१०:३९ )
इनकी देवता मानकर भी पूजा की जाती है। इन्हें
सर्वत्र शिव का उपासक माना गया है । ( मत्स्य