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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 984 में से

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पृष्ठ 404

प्रथम तरंग २९७

[बायाँ स्तम्भ]
सेना उतरी। उसने अपनी सेना का मुख्य भाग
अपने कनिष्ठ भ्राता के नेतृत्व में पीछे छोड़ दिया।
वह एक संकीर्ण दर्रा से गुजर रहा था। बाला-
दित्य की सेना ने उस पर आक्रमण किया।
मिहिरकुल बन्दी बना लिया गया। बालादित्य
उसका वध करना चाहता था। परन्तु उसकी
माता ने उसे रोका। उसे मुक्त कर दिया।
छूटने पर मिहिरकुल ने सुना कि उसका भाई
लौट गया है। स्वयं राजसिंहासन पर बैठ गया
है। उसने कश्मीर के राजा के यहाँ शरण ली।
कश्मीर में मिहिरकुल ने एक विद्रोह आयोजित
किया। कश्मीर के राजा को हटाकर स्वयं राजा
बन बैठा। उसने गान्धार के राजा को भी मार
कर, उसके वंशजों को समाप्त किया। वहाँ का
भी राजा बन गया। स्तूपों तथा संघारामों को
खूब लूटा। देश को भी लूटा। लौटने के एक
वर्ष पश्चात् मर गया। सन् ५६३-५६७ ई० में
मध्य भारत में हूणों का लोप हो गया। तुर्क
तथा ईरानियों ने भी आमू दरया की उपत्यका के
निवासी हूणों का संहार कर हूण शक्ति नष्ट
कर दी।
मिहिरकुल ने साकल अर्थात् स्यालकोट तथा
उसके समीपवर्ती भूखण्डों पर अपना अधिकार कर
लिया था।
मिहिरकुल की मुद्रा पर-'जयतु वृष' 'जयतु वृष
ध्वज' टंकित है। उसकी मुद्राओं पर चन्द्रकला,
वृषभ, त्रिशूल, सूर्य का चक्र तथा शैव चिन्ह टंकित
हैं। 'मिहिर' का अर्थ सूर्य होता है। यह संस्कृत शब्द
है। ईरानी अवेस्ता उल्लिखित मिहिर शब्द मिथ्र
अर्थात् 'मित्र' है। ईरान तथा मन्दसौर के अभिलेख
मिहिरकुल के इतिहास पर यथेष्ट प्रकाश डालते हैं।
प्रश्न उपस्थित होता है कि मिहिरकुल का
क्या कोई शिलालेख आदि भी प्राप्य है। जिसके
कारण कल्हण की बात की पुष्टि हो। यह सिद्ध माना
जाय कि कश्मीर में मिहिरकुल का शासन था। हूण
३८

[दायाँ स्तम्भ]
नरेश मिहिरकुल का ग्वालियर का शिलालेख तिथि
शासन-काल १३, इस विषय पर प्रकाश डालता है।
नाना धातु विचित्रे 'गोपाह्वय नाम्नि भूधरे रम्ये'
कारितवान् शैलमयं भानोः प्रासादवरमुख्यम् ॥ ९
पुण्याभिवृद्धि हेतोर्मातापित्रोरात्मनश्चैव।
धम्मता च गिरिवरे ( ) स्मि (न) राज्ञः ॥१०
'गोपाह्वय नाम भूधरे' यहाँ गोपा का अर्थ मे
गोपाद्रि गिरि अर्थात् गोप पर्वत लगाता हूँ। गोपाद्रि
वर्तमान शंकराचार्य पर्वत है। शंकराचार्य पर्वत के
मूल में डललेक के तट पर गुपकर जिसका प्राचीन
नाम गोपा अग्रहार था, स्थित है। वन, शैल तथा
पुण्य की वृद्धि के लिए वह इस शिखर में निवास
करता है। यह स्थान पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान
जैसा मैं लिख चुका हूँ गोपाद्रि अर्थात् शंकराचार्य
पर्वत के वाम पार्श्व में है। मिहिरकुल के समय में
कश्मीर की राजधानी था। अतएव गिरिवर पर बनाने
की ओर संकेत शिलालेख में किया गया है।
मिहिरकुल बौद्ध धर्म विरोधी हो गया था।
उसके शिलालेख से प्रकट होता है कि वह द्विजगणों
के प्रति आस्था रखता था। यथा—
( यतो ) (नि) र्ममले भाति ॥ ६
द्विजगण मुख्यैरभि संस्तुते च पुण्याह नाद घोषेण।
तिथि नक्षत्र-मुहूर्ते संप्राप्ति सुप्रशस्त (दिने) ७
मातृ तुलस्य तु पौत्रः पुत्रश्च मातृदासस्य ।
नाम्ना च मातृचेटः पष्वं—
( त दुर्गे ( गु वास्तव्यः ) ॥८॥
इसी शिलालेख से तोरमाण और मिहिरकुल का
सम्बन्ध सिद्ध होता है कि मिहिरकुल ऐतिहासिक
प्राणी था। तोरमाण का पुत्र था। कल्हण का वर्णन
वास्तव में कश्मीर में किसी प्रचलित इतिहास के
आधार पर दिया गया है। कल्हण मिहिरकुल को
वसुकुल का पुत्र बताता है। वह मिहिरकुल की
वंशावली ५ पीढ़ियों तक की देता है। कल्हण
मिहिरकुल के पुत्र बक का भी उल्लेख करता है।