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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 984 में से

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पृष्ठ 38

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थे। (रा० ३ : ३९) राक्षस लंका निवासी थे। (रा० ३ : ७४) वे मनुष्यों जैसे थे। स्थापत्य एवं
निर्माण कार्यों में चतुर थे। शबर (रा० ३ : ३३) तथा निशाचर (रा० ३ : ३९) जंगली थे।
वे पौराणिक जातियाँ थीं। उनके स्थान तथा क्षेत्र विस्मृति-सागर में डूब गए हैं। पिशाच तथा नाग जातियाँ
काश्मीर की मूल निवासी थीं। इसी प्रकार सिद्ध गणों (रा० ३ : ४५६) की भी एक जाति थी। खेचर
(रा० ३ : ४५०) जाति का भी मालूम होता है पुराणों के आधार पर कल्हण ने वर्णन किया है।
(रा० १ : ६३, ६६, ६७, १५३, १५९, १९९, २९८, ३००, ३१२, ३१७, २ : १६५) कल्हण ने
बेकाल जाति का भी उल्लेख किया है। (रा० १ : ४८०) एक मत हैं। बंकाल शब्द बंगाल का
अपभ्रंश है।
धर्म : कल्हण कट्टरपंथी नहीं था। वह उदार था। सहिष्णु था। भारत के अन्य भागों के समान
काश्मीर में भी सम्प्रदाय, मत-मतान्तरों तथा पूजा-पाठ की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। भारत में बौद्धधर्म का
लोप हो चुका था। परन्तु काश्मीर में उसकी मान्यता थी। शैव, वैष्णव, तान्त्रिक सभी बुद्ध को अवतार
मानकर पूजा करते थे। बौद्धधर्म काश्मीर में तेरहवीं शताब्दी तक रहा। आज भी काश्मीर के एक सूबा
लद्दाख का वह धर्म है। कवि क्षेमेन्द्र ने कल्हण के एक शताब्दी पूर्व बुद्ध को अवतार मानकर वन्दना किया
था। काश्मीर की जनता शुद्ध वैदिक धर्म के स्थान पर मत-मतान्तरों-तन्त्रों के चक्कर में पड़ गयी थी।
काश्मीर में शैव मत की प्रधानता थी। वह प्रधानता आज भी हिन्दू काश्मीरियों में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती
है। कल्हण इन सबका अपवाद नहीं था। वह शिव एवं बुद्ध दोनों की वन्दना करता है।
महाकवि होते हुए भी कल्हण पुरानी परम्परा का अनुकरण कर मंगलाचरणों में गणेश एवं सर-
स्वती की वन्दना नहीं करता। तत्कालीन संस्कृत लेखकों की परम्परा को तोड़कर उसने अपनी मानसिक
स्वतंत्रता के साथ प्रगतिशीलता का परिचय दिया है।
शिव के उस रूप की वन्दना की है जो एकांगी नहीं है। केवल पुरुष या नारी मात्र नहीं है।
केवल पुरुष एवं प्रकृति मात्र दार्शनिक शब्दों में नहीं है। वह पुरुष, प्रकृति, नर-नारी, पिता-माता दोनों का
समन्वय है। अतएव वह अर्धनारीश्वर रूप है। अर्धनारीश्वर की कल्पना अद्भुत है। उसका दार्शनिक
स्वरूप अत्यन्त भावोत्पादक है। आकर्षक है। सहृदयमय है। जो पुरुष एवं प्रकृति के रूप में जगत को चलाता
है, सृजन का जो मूल स्रोत है, जहाँ संहार एवं लय होता है, साथ ही जो माता स्वरूप पार्वती है, पिता
स्वरूप शिव हैं, जहाँ शिव का योग है, जहाँ देवी पार्वती का स्नेह है, जहाँ शिव त्रिभुवन गुरु हैं, पार्वती
माता है; जहाँ वह शिवभक्ति का वर्णन करता है वहाँ उसकी आन्तरिक भावना, उसकी अटूट श्रद्धा अपनी
पूर्ण गरिमा में निखर आती है। (रा० २ : १२१-१७१)
तन्त्र : कल्हण प्रत्यभिज्ञा दर्शन का अनुयायी था। वह शैव था। तन्त्र-मन्त्र में विश्वास करता
था। किन्तु उसने तत्कालीन तान्त्रिकों की दुष्ट प्रवृत्तियों की आलोचना की है। तन्त्र साहित्य का अध्ययन
किया था। सर्व प्रथम उसने मातृ चक्र का उल्लेख जलोक की पत्नी ईशान देवी के सन्दर्भ में किया है।
इससे ध्वनित होता है कि कल्हण के अनुसार अशोक के समय में बौद्धधर्म काश्मीर में प्रवेश कर वृद्धि प्राप्त
किया और उसके पुत्र के समय में तन्त्रों का भी प्रचार हुआ। इस प्रकार बौद्धधर्म तथा तन्त्र एक साथ
काश्मीर में जड़ जमाने लगे। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से यह दोषपूर्ण है। तंत्र का आरम्भ यद्यपि आधुनिक
शोधों की सहायता से बहुत पहले ले जाया गया है किन्तु उसे अशोक के काल से संबंधित करना उचित
नहीं लगता। कदाचित् समकालीन बौद्धधर्म में तंत्रों के व्यापक प्रसार के कारण ही कल्हण की ऐसी