राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 362, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २६५
पित्रा विद्याधरेन्द्राय प्रदातुं पार्रकल्पिता ।
इरावत्यहमेषा च चन्द्रलेखा यवीयसी ॥ २१८ ॥
२१८. 'पिता ने विद्याधरेन्द्र¹ को मुझे देने की परिकल्पना की है। मेरा नाम इरावती²
और इस युवती का चन्द्रलेखा³ है।'
पुनर्द्विजोऽभ्यधादेवं नैष्किञ्चन्यं किमस्ति यः ।
ताभ्यामवादि तातोऽत्र हेतुं वेत्ति स पृच्छ्यताम् ॥ २१९ ॥
२१९. द्विज ने पुनः कहा—आप इतनी निष्किञ्चन (दरिद्र) क्यों हैं ? उन दोनों ने उत्तर दिया
इसका कारण पिता जी जानते हैं। उनसे पूछिए।
ज्येष्ठेऽत्र कृष्णद्वादश्यां यात्रायै तक्षकस्य तम् ।
आगतं चूडया तोयस्यन्दिन्या ज्ञास्यसि ध्रुवम् ॥ २२० ॥
२२०. 'ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी को तक्षक नाग¹ की यात्रा के लिये आये हुए, उनके जलस्यन्दी
चूड़ा से उन्हें निश्चय जान लेंगे।'
पाठभेद :
श्लोक संख्या २१८ में 'च' का 'मे' पाठभेद
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२१८ (१) विद्याधरेन्द्र : विद्याधरेन्द्र जाति के
राजा का अर्थ यहाँ है। विद्याधर एक देव योनि
विशेष है। पुराणों में इनके राजाओं का नाम चित्र-
केतु, चित्ररथ, अथवा सुदर्शन दिया गया है।
(मा० ६.१७:१;११.१६२९) वायु पुराण (३८-
१६) में पुलोमन को विद्याधरपति कहा गया है।
इनकी स्त्रियों को विद्याधरी कहा जाता है।
(ब्रह्माण्ड पु० ३:५०.४०)
इन देवताओं के शैवेय, विक्रान्त एवं सोमनस
नामक तीन प्रमुख गण थे। (वायु० ३०:८८) इनका
विद्याधर नामक नगर ताम्रपर्णी सरोवर एवं पतंग
पर्वतमालाओं के मध्य है। (मत्स्य० ६५:१८)
(२) इरावती : पंजाब की एक नदी है। रावी
का नाम इरावती है। ब्रह्मा की भी एक नदी का
नाम है। कश्यप की कन्या का नाम इरावती है।
इरावती का विस्तृत वंश ब्रह्माण्ड में है। यहाँ पर
यह शब्द केवल नाम के लिये प्रयुक्त किया गया है।
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(३) चन्द्रलेखा : चन्द्रलेखा का अर्थ चन्द्रमा
की कला है। एक अप्सरा का भी नाम चन्द्रलेखा पुरा
साहित्य में आता है। चन्द्रलेखा बाणासुर की कन्या
एवं उषा की सखी थी। यहाँ केवल नाम का
बोधक है।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या २२० में 'ज्येष्ठे' का 'ज्यैष्ठे' तथा
'चूडया' का पाठभेद 'चूलया' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२२० (१) तक्षक नाग : वीही परगना के
जयवन वर्तमान जेवन के समीप एक पवित्र स्वच्छ
नाग है। सिपोर से दो मील से भी कम दूरी पर
उत्तर-पश्चिम जेवन पड़ता है। वह नाग सरोवर आज
भी वर्तमान है। मैं वहाँ पर दो बार आ चुका हूँ।
उसमें आज भी तक्षक नाग की पूजा की जाती है।
यह स्थान श्रीनगर से ५ मील दूर है। विक्रमांकदेव
चरित्र के लेखक विल्हण ने इसका बड़ा ही सुन्दर
वर्णन किया है। इसके समीप ही खोनमुख ग्राम में
उसका जन्म हुआ था। (१८:७०) विल्हण कहता है :
प्रवरपुर (श्रीनगर) से डेढ़ गव्यूती पर स्थित है।
जयवन में एक ऊँचा स्मारक है। उसे जयवन कहते