राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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कल्हण का समय : कल्हण तथा राजतरंगिणी के समझने के लिए कल्हणकालीन परिस्थितियों
का अध्ययन आवश्यक है । वह काल भारतीय तथा कश्मीर राजनीति में उथल-पथल का समय रहा है ।
लेखक पर उसकी परिस्थितियों, वातावरणों एवं घटना-क्रमो का जाने-अनजाने प्रभाव पड़ता रहता है ।
वह प्रभाव उसकी रचना में परिलक्षित होता है ।
राजतरंगिणी के रचना-काल से ४३६ वर्ष पूर्व सन् ७१२ ई० में सिन्ध पर प्रथम मुसलिम आक्रमण
हो चुका था । मुहम्मदबिन कासिम मुलतान तक पहुँच गया था । सन् १००० ई० अर्थात् राजतरंगिणी के
रचना-काल से १४८ वर्ष पूर्व महमूद गजनो का भारत पर आक्रमण हो चुका था । महमूद गजनी ने सन्
१०१५ ई में कश्मीर पर आक्रमण किया था । सन् १०२६ ई० तक सोमनाथ पहुँच गया था । सन्
१०३० ई० में अलबेरूनी स्पष्ट लिखता है 'मुसलिम आक्रमणों के कारण हिन्दू काश्मीर चले गए । उन दिनों
वाराणसी तथा काश्मीर हिन्दू विद्या के सर्वश्रेष्ठ स्थान थे ।' ( पृष्ठ १७६-१७७ )
काश्मीर में विद्वानों का भाग कर आने का एक कारण और था । काशी अलप्तगीन के आक्रमण से
लूटी जा चुकी थी । जीवन भयापन्न हो गया था । मन्दिर टूट चुके थे । विद्वानों ने काशी को सुरक्षित नही
समझा, किन्तु काश्मीर में महमूद गजनी दो बार हार चुका था । काश्मीर में मुसलमानो का प्रवेश नही
हो सका था ।
काश्मीर की उत्तरी एवं पश्चिमी सीमा पर मुसलिम राज्य स्थापित हो चुके थे । प्रबल हो गए
थे । धर्म-प्रचार का उन्माद व्याप्त था । इसलाम की ताकत के सम्मुख जनता इसलाम कबूल कर अपने
पुरातन बौद्ध तथा हिन्दू धर्म को परित्याग कर चुकी थी । तथापि अभी तक भारत पर मुसलिम राज नहीं
स्थापित हो सका था । सन् १११४ ई० में कन्नौज में गहड़वाल राजाओं का राज था । सन् ११४८ ई०
तक सोलंकी राजा कुमार पाल शक्तिशाली था । महमूद गजनी एक आँधी की तरह आया और चला
गया । सन् ११६२ ई० में अर्थात् राजतरंगिणी की रचना के ४४ वर्ष पश्चात् मुहम्मद गोरी ने भारत पर
आक्रमण कर मुसलिम राज स्थापित किया ।
कल्हण के काल में भारत पर मुसलिम राज्य स्थापित नही हुआ था । परन्तु कल्हण ने तरंग ६ से
८ तक गौण रूप से मुसलिम प्रभाव का उल्लेख किया है । काश्मीर पर मुसलिम संस्कृति का प्रभाव पड़ने
लगा था ( रा० ७ : ११४९ ) । भारत पर मुसलिम आक्रमण का परिणाम भयावह हुआ । धर्म तथा
जीवन की रक्षा के लिए ब्राह्मण तथा विद्वान, नैपाल, काश्मीर तथा दक्षिण भारत भागने लगे । काश्मीर में
उत्तर-पश्चिम भारत से पण्डितो का समूह पहुँच गया । वे अपने साथ ग्रन्थों का भण्डार लेते आये । उस
समय काश्मीर मण्डल विद्वानों से भर गया था ।
मुसलिम आक्रमण की एक और प्रतिक्रिया हुई । गुरुकुल टूटने लगे । आश्रमों का लोप हो गया । वेद
पूर्व काल में लिपिबद्ध नही थे । गुरुकुल तथा आश्रमों में वे स्मरण रखे जाते थे । उनको लुप्त होने से बचाने
के लिए सर्वप्रथम काश्मीर में वे लिपिबद्ध किए गए । अलबेरूनी के अनुसार वे बारहवी शताब्दी में लिपिबद्ध
किए गए थे । काश्मीरी ब्राह्मण तथा शुक ने लिखने तथा व्याख्या का कार्य किया था । ( पृष्ठ १०७ ; १ :
१२६-१२७ )
बारहवी शताब्दी का पूर्वार्ध काश्मीर मे वंशानुगत संघर्षों, विद्रोहों, षड्यन्त्रों, क्रान्तियो एवं रक्त-
रंजित घटनाओ का काल था । उनके कारण काश्मीर मंडल की प्रगति अवरुद्ध हो गयी थी । काश्मीर