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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 984 में से

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पृष्ठ 23

[ ६ ]
धर्म : कल्हण शैव था । शिव भक्त था। काश्मीरी सामान्यतः शिव उपासक एवं पूजक होते हैं।
कल्हण उसका अपवाद नही था । किन्तु बौद्ध धर्म का भी यह प्रशंसक था। बुद्ध-दर्शन का उसपर प्रभाव
था । शिव भक्ति तथा मत का अत्यधिक वर्णन कल्हण ने किया है । उसके पश्चात् उसने बुद्ध धर्म को ही
स्थान दिया है । उसके पिता प्रतिवर्ष नन्दिक्षेत्र की तीर्थ यात्रा के लिए जाते थे । कल्हण भी पिता के साथ
जाता था । यहाँ नन्दि पुराण भक्ति के साथ सुनता था । भूतेश्वर के पवित्र वातावरण में, मन्दिरों की
सुन्दर श्रृंगलाओ के मध्य, सोदर तीर्थ का जल सेवन करते, प्रकृति के शान्त, गम्भीर, सुरम्य, हरित वाता-
वरण में यह शैवदर्शन एवं शिव सम्बन्धी कथादि सुनता था । इस वातावरण का संस्कार बाल्यकाल से ही
उस पर पडा था । उसने शैव दर्शन के आचार्य भट्ट मल्लट का नाम आदर एवं श्रद्धा के साथ लिया है ।
कल्लट ने काश्मीर में शैव शास्त्र का प्रचार किया था । ( रा० ५ : ६६ )
शिवभक्त राजाओ का जहाँ भी कही कल्हण ने वर्णन किया है उसकी लेखनी से उनके लिए श्रद्धा-
भक्ति प्रकट हुई है । जलोक ( रा० त० : ३३५-३३८ ) विजय ( रा० २ : १ ) सन्धि मति ( रा० २ :
६५ ) इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। उन्होने शैव मत का प्रचार किया था । शिव-पूजक थे । कल्हण ने स्वर्ग
प्राप्ति किंवा किसी पुण्य लोक में जाने की अपेक्षा शिव सायुज्यता को प्राथमिकता दी है । ( रा० १:१५२ )
शिव मन्दिरो में शिव के सम्मुख नृत्य-गान का वर्णन ललित पदों में किया है । ( रा० : १ : १५१, १५४,
२७६, २८० )
रावण शिव भक्त था । शेष भारत में यह अत्याचारी, कुमार्गी एवं राक्षस रूप में चित्रित किया
गया है । किन्तु कल्हण शिव भक्त होने के कारण रावण के लिए अशोभनीय शब्दों का प्रयोग नहीं करता ।
भारत में शायद ही कोई रावण नाम अपने पुत्र का रखता है । काश्मीर में रावण नाम के अनेक राजा हुए
हैं । शिव उपासक होने के कारण रावण के प्रति शिवभक्त काश्मीर की जनता ने घृणा नही प्रकट किया
है । शिव की रावण पर कृपा थी । इस मान्यता की वृद्धि के लिए रामायण कालीन रावण द्वारा पूजित शिव-
लिंग काश्मीर में स्थापित करने की चर्चा कल्हण करता है । ( रा० ३ : ४४, )
शिव का प्रतीक शिव लिंग हैं। शिवलिंगों की स्थापना एवं उनकी पूजा का उल्लेख करते, कल्हण
थकता नही । राजा सन्धि मति ने महालिंगो, महा वनों, महा वृक्षों तथा महा त्रिशूलों से काश्मीर मण्डल
को आच्छादित कर दिया था । इस स्थल का वर्णन अतीव श्रद्धा एवं वन्दनामय वाणी में किया गया है ।
( रा० २ : १३३ ) । शिव भक्त का रूप भी कल्हण ने खींचा है । भस्मस्मेर जटाजूट धारी, अक्ष सूत्र धारी,
एवं रुद्राक्ष अंकित उन्हें चित्रित किया है । ( रा० २ : १२७-१७६ )
स्मशानेश्वर शिव है । योगीश्वर शिव है । कल्हण स्मशान का वर्णन करते हुए वहाँ सन्धीश्वर
स्थापना का उल्लेख करता है । ( रा० २ : १३४ ) प्रतिमा लिंगों की स्थापना की भी चर्चा करता है ।
( रा० २ . १३५ ) शिव की अर्चना ( रा० २ : ११४, १३८ ) भूतभावन की प्रसन्नता ( रा० २ : १५१ )
भूतभर्ता अर्थात् भूतेश किंवा नन्दीश पूजा तथा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करता है । ( रा० २ : १६६ ) शिव-
भक्तो के वर्णन में वह तल्लीन हो जाता है । वह कहता है—'पशुपति के पाद मूल में जो जाता है, उसे
भस्म मिलता है । और जो शिव उपासक वृषभ की सेवा करता है, उसे सुवर्ण की प्राप्ति होती है।' कल्हण
यहाँ पर शिवभक्तो का स्थान बहुत ऊपर उठा देता है । ( रा० ३ : १९९ )
कल्हण ने सम्पूर्ण राजतरंगिणी में भगवान् बुद्ध के प्रति अनुपम आदर एवं श्रद्धा प्रदर्शित की है ।
अशोक से लेकर उसके काल तक जिन राजाओं ने बुद्ध विहार, स्तूप तथा चैत्यादि निर्माण कराया था उनका