राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १२१
अथाभवत् लवो नाम भूपालो भूमिभूषणम् ।
वेल्लद्यशोदुकूलायाः प्रीतिपात्रं जयश्रियः ॥ ८४ ॥
छवि¹
८४. अनन्तर जयश्री² का प्रिय पात्र उल्लोलित दुकूल धारी भूमिभूषण लव राजा
हुआ ।
यस्य सेनानिनादेन जगदौन्निद्र्यदायिना ।
निन्यिरे वैरिणश्चित्रं दीर्घनिद्राविधेयताम् ॥ ८५ ॥
८५. उसके सेना का निनाद जिसने दुनिया की नींद हराम कर दी थी, आह ! आश्चर्य है !!
वैरियों को लम्बी नींद में सुला दिया था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८४ में 'दुकूलायाः' का पाठभेद
'दुगूलायाः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
८४ (१) लव : मुस्लिम इतिहासकारों ने लव
का नाम लू अथवा लूलू लिखा है । उसने लोलार
नगर बसाया था ।
आइने अकबरी में अबुल फज़ल ने लिखा है ।
लोलार कश्मीर का पश्चिमी अंचल था । यहाँ उसके
निर्माण की साक्षी वहाँ के एक करोड़ शिलाखण्ड व
स्मारक दे रहे थे । आइने अकबरी के अनुसार नगर
का आकार सम्राट् अकबर के समय तक देखा जा
सकता था ।
इतिहासकार हसन ने लव का निर्वाचन होना
लिखा है । कल्हण ने केवल ४ श्लोकों में इस राजा
का वर्णन किया है । कल्हण ने अन्य राजाओं तुल्य
लव का वर्णन नहीं किया है कि उसने किस प्रकार
राज्य पाया । स्पष्ट है कि लव पूर्वकालीन राजवंश
से भिन्न वंश अथवा कुल का था । उसने अपने राज-
वंश की नवीन परम्परा चलाया ।
कल्हण ने लव, कुश, खगेन्द्र, सुरेन्द्र, गोधर
सुवर्ण जनक और सचीनर का नाम पद्ममिहिर के
आधार पर लिखा है । पद्ममिहिर की तालिका
विवादास्पद है ।
१६
लोलार के साथ लव का नाम व्यर्थ जोड़ दिया
गया है । डाक्टर थी हुल्त्ससेह ने आलोचना की
है । स्थानीय नाम लवादि राजाओं के साथ वह इस
लिये जोड़ दिया गया है कि स्वरविज्ञान किंवा
साम्य ध्वनि पर आधारित मालूम होता है । स्थानीय
नामों के अर्थ लगाने में प्राय यह प्रवृत्ति देखी गयी
है कि उसे किसी न किसी राजा के नाम के साथ
जोड़ दिया जाता है । वे राजा चाहे काल्पनिक किंवा
सत्य क्यो न रहे हो । कश्मीर के स्थानों के नामों
को इस बात ने बहुत प्रभावित किया है । ( विल्सन
द्वारा उल्लिखित पृष्ठ १७ )
था स्टीन उक्तमत का समर्थन करते हैं । उनका
भी मत है कि यह बात पद्ममिहिर की तालिका के
सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न करती है ।
(२) जयश्री : विजय देवी का चित्र भारत तथा
पश्चिम देशों में तूर्य सहित आकाश में उड़ते हुए वस्त्रों
के साथ दिखाया गया है। उनके पृष्ठ भाग में मेघ रहता
है । वह बहती वायु का प्रतीक है । श्रीदेवी के दुकूल
किंवा वसन में भरती हवा अभिराम, उत्साह, उमंग एवं
उल्लास पूर्ण चित्र उपस्थित करती है । विजय देवी
पश्चिम में जैतून शाखा का मुकुट किंवा केवल पल्लव
युक्त शाखा लिये दिखाई गयी है । वह शान्ति, सन्धि,
मैत्री, तथा वीरता की प्रतीक मानी जाती है । भारत
में जैतून के पल्लव एवं शाखा के स्थान पर माला
एवं पुष्प चित्रित किया जाता है ।