पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)
Prithvirajavijaya Mahakavya of Jayanaka with Commentary
कश्मीरी कवि जयानक (टीकाकार: जोनरराज) द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ें"करभो नूनं दृष्टो यतो निर्निमेषत्व(l.7)मद्गणां जातमन्थाचि निमेषसुखं"
"लभेत . उष्ट्रोदर्शनीय इति प्रसिद्धिः . अतो हस्तौ दृष्टेः पिधानत्वं(l.8) नीत्वा"
"बनदेवता राजानमपि द्रष्टूं न प्रापुः ॥ २२."
Aha! Look at the commentary:
"बनदेवता राजानमपि द्रष्टुं न प्रापुः ॥ २२."
"वनदेवता राजानमपि द्रष्टुं न प्रापुः"!
So in verse 22:
"द्रष्टुं नरेन्द्रमपि नापुः + अरण्यदेव्यः"!!
YES! "अरण्यदेव्यः" (the forest goddesses)!
"नापुः" + "अरण्यदेव्यः" = "नापुररण्यदेव्यः" (or "नापुररण्यदेव्यः" as printed)!
And in Verse 23:
"प्रासादमून्नतमकारयदप्यररण्ये ॥" (or "अप्यरण्ये")
Commentary:
"स राजा वने प्रासादम(l.11)कारयत्" -> "वने" = "अरण्ये"!
So in verse 23 it is "अरण्ये"!
Now look at Verse 22