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पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)

पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)

Prithvirajavijaya Mahakavya of Jayanaka with Commentary

कश्मीरी कवि जयानक (टीकाकार: जोनरराज) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

३०२ पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्.
स एव प्रथमं तिलोत्तमाना[म]·············(l. 23*)·········रि-
ष्यति ॥ 34.
विदधात्ययमुत्तमं यदि
प्रभुभक्त्या पृथिवीबृहस्पतिः .(l.1)
‿ ‿ ‿ ‿ [तिलोत्तमा
सदनं स्वामि]कृते प्रवेक्ष्यति ॥
पूर्वश्लोकार्थमेव प्रपञ्चयति . स्वामिभक्तयायं(l.2)·············
[तिलो]त्तमा स्वयमेव स्वामिकृते गृहमेष्यति ॥ 35.
नैतदाश्चर्यमित्याह ॥(l.3)
‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ---
‿ ‿ ‿ ‿ कचं सुराङ्गना .
अजमिन्दुमतीमयेन वा
वपुषा किं हरिणी न शिश्रि(l.4)ये ॥
····························नाभ्यलषत् इन्दुमतीरूपेण हरिणीनाम्नी नाकस्त्री
किं नाजमश्रयत् ॥(l.5) 36.
‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿ ‿
‿ ‿ ‿ ‿ जितोपि मन्मथः .
इममेकशरीरमेव किं
हृदयस्थोपि न वेद शूलि(l.6)[नः] .
·············काम इमं राजानं हरस्यैकशरीरं[न वेद] . 37.
तदवश्यमसौ तिलोत्तमा
द्युनदीवावततार भूतलम् ·
1 See p. 156, note 3. 2 Ms. 'यं'.