पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५
अरब खां का कहना कि हुसैन खां को निकाल
देने के लिये सुलतान ने कहा है ॥
छंद पद्धरी ॥ उच्चरौ वैन आरब्ब सेष । सल्लाम बहुत पनि एक एष ॥
कढ्ढौ हुसेन तुम देस अंत । साचाव साचि वंकौ सुसंत ॥ इं० ॥ ४३ ॥
जुगमीत अच्छिय उवरै न आदि । इस ताउ आउ बहु वैन सादि ॥
जंपे सुं दैल जे कहे साचि । कढ्ढो न वत्त गंभीर आचि ॥ ळं० ॥ ४४ ॥
शहाबुद्दीन का संदेसा सुनकर पृथ्वीराज का
मुख लाल हो गया, भौहें चढ़ गईं ॥
संभखिय वत्त प्रथिराज संत । त्रिकुटी कङ्कर द्विग रक्त जंत ॥
आरक्त मुष्प स्तुत ओन बुंद । कनमन्तिय कोप रोमांच जिंद ॥ इं० ॥ ४५ ॥
कैमास ने डपट कर कहा कि आर्य लोगों का धर्म सुलतान
नहीं जानता इससे ऐसा कहता है, हुसैन पृथ्वीराज के
शरणागत है, छत्री का धर्म उसे छोड़ने का नहीं है ॥
उच्चरौ कोपि कैमास वानि । अतासनि आर्य सिंचौ सुजानि ॥
आरब्ब बोल दोल्यौ विरूर । सुरतान जानि जंप्यौ गहूर ॥ इं० ॥ ४६ ॥
पनि वुद्ध खच्चौ प्रथिराज तूर । ऋतुवित्त जुद्ध सामंत सूर ॥
हुस्सेन आइ प्रथिराज थान । जोधांन भ्रम पचीय आन ॥ ळं० ॥ ४७ ॥
कन्ह चौहान, सूरसिंह, गोयंदराज, चन्द, पुंडीर
आदि का भी यही कहना और सुलतान
से लड़ने को हम प्रस्तुत हैं यह कहना ॥
जंपै सुवैन चहुभ्रंनि कन्ह । द्विग पनि रक्त रोमांच तंन ॥
रज भ्रम विषम बुझक्कै न साच । अनि राच्च जेम जंपै विराह ॥ इं० ॥४८॥
गज्जै न लज्ज कोपैं मृगिंद्र । उत्कृष्ट सूर सिर सहि न निंद्र ॥
गुरु तज्जि जंपि गोइंद राज । लग वैन गीर गरु वत्त साज ॥ इं० ॥४९॥
संज्वान तेज सम तेज बान । निरभै सुतासु चंपै पयान ॥
उच्चल्यौ चंद पुंडीर कोप । आदीत भाज रस दून छोर ॥ इं० ॥ ५० ॥