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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 470 में से

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पृष्ठ 100

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ८६
ढनकत ढोल, झलकत कुंत । विकसंत सूर सकसंत जंत ॥
छल छलत सिंधु वर चल अनूप । झल मल्लत सिप्प पप्पर सन्नूप ॥ छं० ॥ ४३५ ॥
वर विजय वड्डि चालुक्क देश । बहु मिलत भूमियां ज्ञेय पेस * ॥
अरि गवत्त गाढ तिन धरनि षंड । इहि रीत राज वसु विजय मंड ॥ छं० ४३६ ॥
करि अग्ग मह गल्ल सहस ड्रप्प । वर माघ मास उज्जलौ पप्प ॥
दस कोस जाय सुक्काम † कीन । विच गाम नगर पुर लूट लीन ॥
छं० ॥ ४३७ ॥ रु० ॥ २१३ ॥
॥ बीसलदेवजी की खबर सुन वालुका राव का जलभुन जाना ॥
दूहा ॥ सुनिय षवरि ‡ वालुक तवै । तमकि सु उठ्यौ ताम ॥
मानों प्राजारिय अगिन । नर निरधूम विराम ॥
छं० ॥ ४३८ ॥ रु० ॥ २१४ ॥
॥ वालुका राव का नित्य नैम करके लड़ने को तयार होना ॥
पद्धरी ॥ वालुका राइ चालुक्क वीर । मंगाइ नीर मंज्यौ सरीर ॥
धरि चरन अंब अंजुली कीन । धरि कंठ विष्प धारिय कुलीन ॥ छं० ॥ ४३९ ॥
जुध आज करौं कहि कहा कालि । जो जाउँ भज्जि तौ गोत गालि ॥
इतनी भूमि पिचो न कोह । अड्डौ न फिरैगा मिलि लेय लोह ॥ छं० ॥ ४४० ॥
पषरैत तुरिय पषरैत गज्ज । नर कस्से बगतर् सिन्नह सज्जि ॥
असवार भये तब प्रवरि दीय । वालुका राइ आयौ अबीच ॥ छं ॥ ४४१ ॥

  • हिं० पेस (SK. प्रेष्य m. A servant, a slave. n. Service, servitude. Hence a tribute
    or present such as is only presented to conquerors, princes, great men & superiors.
    हिं० पेश अथवा पेस + कशी अथवा कसी (SK. प्रेष्य and कृष् = to draw, to draw out or
    off, to attract, to raise, to draw up, &c.)
    † हिं० मुक्काम or मुकाम (SK. मुक्त + काम = परिश्रम labour). Hence a halt, a stop in a
    march, &c. Some think it from the SK. मकुष्ट mfn. going lazily, slowly, &c. or SK. म्रक or
    म्रकि or मुक्क to go, to move, &c, & अमनि a road or SK. मुक्त + आम to go.
    ‡ हिं० खबरि or खबर (SK. ख्या to relate, to recount, to say or tell, to celebrate,
    to make known, &c.)
    २१४ पाठान्तरः—पब्बहि । जमि । तांम । सं० १८५६ की में “मनों प्रजारिय अगनि बन” ॥
    विराम ॥