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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

१५६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
ष
षष्ठवक्त्र छठवाँ अवयव, गुदा के मूल के पास का मेद्रकंद
स
संवित् चेतना, परम चेतना ।
संवित् देवता समष्टि की दृष्टि से-खेचरी, गोचरी, दिक्-
चरी और भूचरी संवित् देवता है, व्यष्टि की
दृष्टि से आन्तरिक और बाह्य इन्द्रियाँ संवित्
देवता हैं।
संसार जगत्, जन्म-मरण ।
संसारी जीव जिसका संसरण ( जन्म-मरण ) होता
रहता है।
संसृति गमनागमन, जन्म-मरण का क्रम।
संहार बटोर लेना, जगत् का शिव में लय ।
सकल देव से लेकर कीट तक सभी जीव जो माया-
तत्त्व में हैं। इन्हें अपने आत्मा का बोध नहीं
होता और इनमें भेद-बुद्धि बनी रहती है।
सत् अस्तित्व जिसका स्वरूप चित् है।
सत्त्व अस्तित्व, प्राण, प्रकृति का वह गुण जिसका
लक्षण प्रकाश है।
सदाशिव शिव से गिनने पर तीसरा तत्त्व, वह अवस्था
विशेष जिसमें अहं (मैं) का प्राधान्य रहता है
ओर इदं (यह विश्व) अस्फुट रहता है। इस
तत्त्व का दूसरा नाम है सादाख्यतत्त्व । इस
तत्त्व में इच्छा की प्रधानता होती है।
समरस समचेतन
समाधि चित्त की प्रगाढ एकाग्रता ।
समान पंचप्राणों में से वह प्राण अथवा वायु जो
भोजन इत्यादि का समीकरण करता है और
प्राण और अपान वायु का सन्तुलन करता हैं।
समापत्ति समाधि की परिपूर्णता ।
समावेश शिव या शक्ति से आविष्ट होना, वैयक्तिक
चेतना का ईश्वरीय चेतना में लय ।
सहज स्वाभाविक ।

पारिभाषिक शब्दों का कोश १५७
सामरस्य चेतना का एकात्म्य, शिव और शक्ति का
तादात्म्य ।
संकोच सिकुड़न, परिमितता ।
सांख्य वह दर्शन जो पुरुष और प्रकृति को दो सर्वथा
भिन्न मूल तत्त्व मानता है। इस दर्शन का
अनुयायी भी सांख्य कहलाता है।
सुषुप्ति गाढ़ स्वप्नरहित निद्रा की अवस्था ।
सृष्टि सर्जन, निस्सरण, निर्गम, प्रकटीकरण ।
सर्वकर्तृत्त्व सब कुछ करने की शक्ति ।
सर्वज्ञत्व सब कुछ जानने की शक्ति ।
स्थिति धारण, रखाव ।
स्वप्न सपने की अवस्था ।
स्वरूप अपना वास्तविक रूप, वास्तविक भाव,
मूलवस्तु ।
स्वरूपापत्ति अपने वास्तविक रूप की प्राप्ति ।
स्वतन्त्र अपनी इच्छानुसार निरपेक्ष अबाधित कर्ता ।
स्वातन्त्र्य परमशिव का निरपेक्ष अबाधित इच्छानुसार
कर्तृत्व ।
स्वात्मसात्कृ अपने में मिला लेना, अपने में समीकरण कर
लेना ।
स्वेच्छा शिव या शक्ति की अपनी इच्छा, स्वातंत्र्य ।
ह
ह शक्ति का प्रतीक ।
हठपाक अनुभव का प्रमातृचेतना के साथ सात्मीकरण
की निरन्तर आग्रही प्रक्रिया ।
हेतु कारण
हेतुमत् कार्य
हृदय केन्द्रीय चेतना, आध्यात्मिक केन्द्र ।

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अकारादिक्रम से मुख्य शब्दों की अनुक्रमणिका
अ अनुप्रवेशक्रम ८८
अकार १५ अनुभयात्मा ६४
अकृतक १५ अनुभाव ८५
अक्रम ६४, ८६, ९७ अनुरूप ४९
अकिञ्चिच्चिन्तकतवेन ८४ अपरिच्छिन्न ४६
अकुल १५ अपरिज्ञान ७०-७६
अख्याति ५१, ५३, ५९ अपवर्ग ६०
अज्ञान ७१, ७४ अप्रकाशमानत्वेन ४४
अधः कुण्डलिनी ८७ अप्रतिहतस्वातन्त्र्यरूपा ६५
अधोवक्त्र ८३ अपान ७५
अध्यवसाय ९७ अपूर्णमन्यता ६६
अध्यारोह ७६, ७७ अभावब्रह्मवादी ६१
अन्तकोटि ८९ अभिज्ञान ६६
अन्तः ७४ अभिधार्थं ४६
अन्तरात्मन् ८६ अभिमान ७३
अन्तःकरण ६६, ७३, ९८ अभ्यास ८१
अन्तर्निगूढ ८६ अभेद ५९, ७३
अन्तर्मुखता ९१ अभेदे ४५, ७२
अन्तर्मुखी ७६ अभेदेन ५०
अन्तर्मुखीभाव ७७ अभेदालोचन ७४
अन्तःस्वरूपया ९१ अभेदनिश्चय ७४
अन्तर्लक्ष्य ८३ अभेदविषय ७२
अनन्त ९७ अभेदव्याप्ति ६५
अनन्तभट्टारक ५० अमृतत्व ८६
अनाश्रित ५१, ५५ अमृतस्यन्दिनी ८५
अनुग्रह ६७ अमायीय ९८
अनुग्रहीतृता ६८ अमोक्षे ६३
अनुत्तर १५ अर्थावभास ७१

( २ )
अर्थावरोह ६५ आभास ६८
अलंघास ७० आभासन ६९
अवरोहक्रम ८२ आभाति ६९
अवरोहपद ७७, ७८ आभ्यन्तर ९२
अव्यक्त ६१, ६२ आमर्श ९२
अवस्थानम् ४९ आलोचन ७३
अवस्थितस्य ४८ आवेश ४६
अवास्तवता ४७ आवेशवश ९१
अविकल्प ७१, ७२, ८४ आवृत्तचक्षु ८६
अशेषशक्तित्वम् ४८ आर्हत ६२
असत् १ इ
अस्फुट ७१ इच्छा ५९
असमसुख ८५ इच्छाशक्ति ६५
असम सौख्य ९० इदन्ता ५०
असंकुचित ६५ ई
असाधारण ७१ ईश ५५
अहन्ता ९६ ईश्वराद्वय ६७
अहंप्रतीति ६० ईश्वरतत्त्व ४९, ६१
अहंभाव ९५ ईश्वरता =४, ९४, ९५, ९८
आ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ४४, ९९
आगम ६१ ईश्वरभट्टारक ५०
आच्छादन ७९ उ
आणव ५८, ६६ उपनिषत् ४३
आत्मतत्त्व ६१, ६२ उपपन्न ४६
आत्मा ५७, ५८, ६० उपयुक्त ४६
आत्मसात् ७९, ८० उपादान ४८
आत्मोपासक ६३ उपाय ४४
आत्मविश्रान्ति ९५ उपारोह ४६
आदिकोटि ८९ उभयरूपा ६४
आद्यन्तकोटिनिभालन ८३ उल्लास ९०
आदिक्षान्त ७१, ९४ ऊ
आनन्द ५९, ६० ऊर्ध्वकुण्डलिनी ८७

( ३ )
ऐ
ऐश्वर्यशक्ति ७४
क
कञ्चुक ५९
कठवल्ली ८५
कठिनत्वेन ५२
कर्तृत्व ५५
कर्तृतात्मा ७४
कर्तृताशून्य ५०
कर्मेन्द्रिय ६६
करणेश्वरी ७९
कला ४६, ५९, ६६, ७३, ९४
क्रममुद्रा ९१, ९२
कारणत्व ४४
कार्यकारणभाव ४५
कामं ५८
काल ४५, ४७, ५८, ५९, ६६, ६७
कालाग्नि ९४
किञ्चित्कर्तृत्व ६६, ७३
किञ्चिज्ज्ञत्व ६६
कृत्रिम ६०
कृशा ६४
क्रिया ५६, ५९
क्रियाशक्ति ६६
क्रीडा ८२
ख
खानि ८६
ख्याति ५३
खेचरी ७३
खेचरीचक्र ७३

ग
ग्राहक ४७, ४९, ५१, ५२, ५३, ५४,
५८, ७१, ७७
ग्राह्य ४७, ४९, ५०, ५१
गृहीतप्राणादिसंकोच ५८
गृहीतसंकोच ७५
गोचरी ७३
गोचरीचक्र ७३
च
चक्रवर्ती ९८
चक्रेश्वर ९८
चतुरात्मा ५८
चमत्कार ६९
चार्वाक ६०
चित् ४५, ४९
चितः ४५, ४८, ५६, ७९
चितिः ४४, ४५, ४६, ५१, ५४, ७६,
७७, ७८, ८०
चित्त्व ४८
चित्प्रकाश ४५, ७५
चित्प्राधान्य ५४
चित्प्राधानत्वे ५५
चित्तम् ५४, ५६, ५७, ७६
चित्तमय ५६
चित्तसंस्कारवती ५७
चितिचक्र ९८
चितिवह्नि ७७
चितिशक्ति ७३, ९२, ९७
चितिशक्तिमयीप्रथा ९६
चिदग्नि ६९
चिद्रूप ९७

( ४ )
चिद्वत् ६७, ७५ त
चिदात्मन् ६७, ७४ तत्त्व ५४
चिदात्मा ५८, ६५ तदग्र ८७
चिदानन्द ७२, ८१, ८२, ९० तदात्मा ९०
चिदानन्दघन ४३, ६३, ७५ तन्मध्य ८७
चिदैक्य ९१ तन्मयत्व ९०
चिदैकात्म्य ८१ तन्मयीकरण ९६
चिन्ता ५३ तन्मूल ८७
चिन्मय ५३ तमस् ५५, ५६
चेतन ५१, ५४, ७६ तांत्रिक ६२
चेत्य ५४, ५५ तीक्ष्णतर्कशास्त्र ४४
चेत्यमान ८१ तीक्ष्णयुक्ति ९९
चैतन्यम् ५७ तुरीया १२
चैतन्यविशिष्ट ६० तुर्य ७५, ८८
तुर्यातीत ७५, ८४
छ त्रिकादिदर्शन ६२
छन्न ७५, ७७, ७८ त्रिमय ५८
छाया ४६ त्रिशिरोभैरव ५२
छेद ८८
द
ज दर्पण ४८
जगत् ४५ दर्शन ६०, ६३
जगतः ४९ द्वादशान्त ८९
जगदात्मना ४५ दिक्चरी ७३
जगदानन्द ९५ दिक्चरीचक्र ७३
जाग्रत् ७५ द्विरूप ५८
जीव ५४, ६१ दुःख ६०
जीवन्मुक्त ६८, ८२ देव ६७
जीवन्मुक्ति ७५, ८१ देश ४५, ४७, ५८, ६७
ज्ञान ५६, ५९, ६०, ९७ देह ४७, ६७, ७२, ७५, ७६, ७९,
ज्ञानसन्तान ६० ८१, ८२, ९६
ज्ञानशक्ति ६६ दृगादिदेवी ६९

( ५ )
द्वार ८६ पराङ् ८६
न परानन्द ९०
नष्ट ६९ पराञ्चि ८६
नाना ४९ परादशा ८५
नाडीसहस्र ८३ पराद्वय ४६
नासापुट ८७ पराप्रकृति ६१
नित्यत्व ६६ पराभूमि ७७
नित्योदित ४५, ७१, ९०, ९१, ९२, ९३ परामृष्ट ६९
निमज्जन ७९, ८०, ८१, ९६ परावाक्शक्ति ७१
निमज्ज्य ६५ पराशक्ति ४४
निमिषति ४४ पशु ५५, ५६
निमीलन ९७ पशुदशा ७५
निमीलितसमाधिक्रम ९१ पशुभूमिका ७३
निमेष ८६ पशुहृदयम् ७४
नियति ५९, ६६ पश्यन्ती ६१, ७१
निश्चय ७३ पञ्चत्रिंशत् ५९
निलीनाक्ष ८९ पञ्चकस्वरूप ५९
निहितचित्त ८४ पञ्चविधकृत्य ६७, ६८, ६९, ७०, २४
नील ४७, ५५, ६३, ६७, ७८, ८१, ९६ पञ्चकृत्य ४३
नैयायिक ६० पञ्चकृत्यकारित्व ७६
परिणाम ६१
प परिज्ञान ४७, ५४, ७४, ७६
परप्रमातृ ४४ परिपूर्णता ४५
परमयोगी ९०, ९४, ९८ परिमितानाम् ५०
परमशिव ५१ पद्मसंपुट ८९
परमानन्द ५१ पतिदशा ७२
परमार्थ ४३, ४५, ५६ पतिदशात्मा ७५
परस्याः प्रकृतेः ६१ पतिभूमिका ७४
परशक्तिपात ६२ पादोद्देश ४६
परमेशता ८८ पाञ्चरात्र ६१
पाञ्चरात्रिक ६२
परमेश्वर ४१, ६५, ७४, ७५, ७६ पारतन्त्र्य ८५

( ६ )
पारमार्थिक ७३ प्रमातृ ४५, ४७, ४९, ५०, ७३, ९७
पारमेश्वर ४४ प्रमातृता ५५, ८१
पीत ७८ प्रमातृसत्तक ५९
पृथिवी ५२, ५९ प्रमातृव्याप्ति ६२
पुंसि ६२ प्रमाण ४५, ४६, ४७
पुर्यष्टक ५८, ७५, ९८ प्रमेय ४५, ७६, ७८, ८०
पूर्णत्व ६६ प्रलय ९४
पूर्णता ७० प्रलयकेवली ५०
पूर्णाऽहम् ७१ प्रलयाकल ५०
पूर्णाऽहन्ता ९३, ९४, ९६ प्रसर ७९, ८८, ८९
पूर्णा ६४, ६५, ७४ प्रसरणक्रम ७३
पूर्णानन्द ९९ प्राण ४७, ५८, ६०, ७२, ७५, ७९,
प्रकृत्यादि ४५ ८१, ८२, ९६, ९९
प्रकाश ४५, ५०, ९५ प्राणशक्ति ८३
प्रकाशन ४६ प्राणायाम ८४
प्रकाशैकघन ५१
प्रकाशैकात्म्यात् ४५ ब
बृद्धात्मानः ६८
प्रकाशैकात्म्येन ४९ बन्ध ७४, ८४
प्रकाशैक्य ६८ बललाभ ७९, ८०
प्रकाशानन्दसार ९३ बहिर्दृष्टि ८६
प्रकाशाभेदेन ५१ बहि ९७
प्रकाशमानतया ५१ बहिर्मुख ९१, ९२
प्रच्छादन ६२ बहिर्मुखता ७७
प्रतिभा ९७ बहिर्मुखीभाव ६७
प्रत्यगात्मा ८६ बहिष्करण ७३, ७४, ९८
प्रत्यभिज्ञा ४३, ८५ बाह्यस्वरूपप्रवेशः ९१
प्रत्यभिज्ञाकारिका ६७ बीजावस्थापन ६९
प्रत्यभिज्ञाटीका ६५ बुद्धि ८२
प्रत्याहार ९५ बुद्धितत्व ६०, ६२
प्रथमानतासार ८१ बुद्धीन्द्रिय ६६
प्रभु ६७ बुद्धौ ६०

( ७ )
बौद्ध ६२ म
ब्रह्मनाडो ८३ मध्य ८२
ब्रह्मरन्ध्र ८३ मध्यविकास ८२, ९०
ब्रह्मवाद ४७ मध्यमा ७१
ब्रह्मवादी ६६ मध्यधाम ७५
ब्राह्मी ७२ मध्यनाडी ८३
मनुष्य ७१
भ मनीरुढ़ ९०
भक्तिभाजः ४४ मन्त्र ५०, ७१, ९५
भगवती ४४, ४५ मन्त्रमहेश्वर ४९
भगवतः ६७ मन्त्रवोर्यं ९६
भगवान् ६७ मन्त्रेश्वर ५०
भाव ५०, ५५, ७४ मल ५८, ६६
भावस्वभाव ७३ मलावृत ६५
भावराशि ९१ महाफल ४८
भिन्नम् ४५ महानन्दमय ९०
भिन्नवेद्यप्रथा ६६ महामन्त्र ७१
भूचरी ७३ महामन्त्रवीर्यात्मक ९३, ९६
भूचरीचक्र ७३ महार्थदृष्टि ६९
भूमिका ५९, ६२, ६३ महाव्याप्ति ६२
भेद ६४, ६६, ७२, ७३ महाह्रद ९६
भेदनिश्चय ७३ महेशता ७२
भेदभूधर ६९ महेश्वर ६७, ९४, ९७, ९९
भेदवाद ४८ मातृ ७४
भेदव्याप्ति ६५ मात्रया ७७, ७८
भेदविषय ७२ माया ४५, ५०, ५५, ५६, ६३
भैरवमुद्रा ७२ मायादशा ८२
भैरवीमुद्रा ८६ मायापद ७७
भैरवात्मता ९० मायाप्रमाता ५६, ७१
भोक्तृता ९८ मायाप्रमातृता ७८
भोग ४७ मायाशक्ति ५३, ९७
भ्रूभेदन ८७ मायोय ५८, ६६

( ७ )
मायीय शब्द ९४
माहेश्वर्यं ४८, ६८
माहेश्वरीचिति ९९
मीमांसा ६०
मुक्ति ५४, ५७, ७४
मुक्तिद ५९
मुद्रा ८४
मुद्रात्मा ९२
मुद्राक्रम ९१
मेय ७७
मेयजात ६८
मोक्ष ४७, ६३
य
योगिनाम् ४७
योगिवर ९१
र
रक्त ६९
रजस् ५५, ५६
रज्यति ६९
रस ९०
रहस्यरूप ६८
ल
लङ्घितुम् ४६
लय ९८
व
वर्ण ७१
वर्णात्मक ७१
वह्नि ८८
वाचक ९५
वाच्य ९५
वायुपूर्ण ८८
वासुदेव ६१
विकल्प ५४, ५६, ७२, ८४
विकल्पन ७३
विकल्पक्षय ८३
विकल्पक्रिया ७१
विकास ८४, ८८
विग्रह ५२
विग्रही ५२
विज्ञानाकल ५०, ६१
विज्ञानाफलता ५४
विद्या ५०, ५९, ६६
विद्याप्रमातॄता ५४
विद्याराग ६२
विन्दु ९५
विधूतचेतसः ८८
विनाशन ६७
विभव ७२
विमर्श ४४, ९५
विमर्शमय ४७
विमर्शमयी ७१
विमर्शन ६९
विलय ६७, ६८
विलयपद ६९
विलापन ६९
विशेष ४७
विश्व ४५, ४६, ४८, ४९, ५२, ७१,
८०; ९४, ९५
विश्वमय ५१, ५२, ६२
विश्वसिद्धि ४४
विश्वग्रसन ७८

( ९ )
विश्वात्मक ५१ शासन ६७
विश्वात्मसात्कार ८० शांकर ४३, ९९
विश्वोत्तीर्ण ५१, ६२ शिरः ४६
विस्फुलिंग ६१ शिव ४३, ४४, ५१, ५४, ५८, ६६,
विष ८७ ७५, ७६, ९९
विषयपाश ८० शिवात्म ७१
विषयग्राम ९२ शिवधर्मी ९६
विषयास्वाद ९० शैव ६३
विश्रान्ति ४४, ८७, ८८, ९५, ९६ शुद्धबोधात्मानः ५०
विश्रान्तयः ६३ शुद्धाध्व ५५
वीर्यभूमि ९६ शुद्धेतराध्व ६७
वेदविद ६२ शुद्धविकल्प ७२
वैन्दवी ४६ शून्य ५८, ६१
वैष्णव ६२ शून्यातिशून्यात्मतया ५१
वैयाकरण ६१ शून्यपद ७३
व्यवतिष्ठते ४४ शून्यप्राय ६०
व्यवहार ७६ शून्यप्रमाता ५०
व्यापक ६६ शून्यभूमि ५७
व्यामोहित ७२
व्यामोहितत्व ७० ष
व्यामोहितता ७०, ७५ षट्त्रिंशत् ७३
व्युत्थान ८१, ९१ षष्ठवक्त्र ८६
श स
शक्ति ५६ संविद् ६४
शक्तिपात ४४, ७०, ९९ संविद्देवताचक्र ९३, ९४, ९९
शक्तिविकास ८३, ८६ संवित् ८२, ८३, ८४
शक्तिसंकोच ६५, ८३, ८५ संवित्ति ४७, ८२, ९८
शब्दार्थ ५३ संसार ४३, ५७
शब्दब्रह्म ६१ संसारहेतु ५९
शब्दराशित्वरूप ९५ संसारी ६५, ६६, ७५
शरीर ५८, ६०, ७६ संसारत्व ७५

( १० )
संसारित्व ७०, ७१, ७५ संकोचिनी ५४, ७७
संसारभूमिका ६७ संकोचप्रधान ५४
संसारबीजभावम् ६९ संकोचभूः ८८
संहार ४४, ४६, ६४, ६७, ७२, ७९, संकोचवती ६५
९३, ९४, ९८ संकोचात् ६६
संहरन्ती ६४ स्पन्दक्रम ८७
संह्रियते ६१ स्मरणानन्द ८८
सकल ५०, ५९ स्वचित्प्रमातृता ८४
सत् ६१ स्वच्छ ४५
सत्त्व ५५, ५६ स्वच्छन्दादि ६७
सद्गुरूपदेश ७० स्वतन्त्र ४४, ४६, ४७, ९८
सद्गुरुसपर्या ७० स्वतन्त्ररूपा ४५
सदाशिव ६१ स्वप्न ७५
सप्तपंचक ५९ स्वपदा ४६, ९४
सप्तपंचकस्वभाव ५८ स्वप्रकाश ४६
सबाह्याभ्यन्तर ९१ स्वभित्तौ ४८
समाधि ५५, ९०, ९१, ९३ स्वयंभू ८६
समाधिवज्र ६९ स्वरूप ५६
समान ७५ स्वरूपज्ञान ५७
समावेश ४४, ८०, ८१, ८४, ९०, ९१ स्वरूपविकास ६७
सम्पूटीकार ९५ स्वशक्ति ७०
सर्ग ७२, ७९, ९३, ९४, ९८ स्वशिरः ४६
सर्वकारणत्व ४८ साक्षी ४४
सर्वदर्शन ५९ सांख्य ६१
सर्वपेक्षानिरोध ९५ साधक ९२
संकल्प ९७ सामान्यस्पन्द ९८
संकुचित ५१, ५२, ५३ सामरस्य ४६
संकुचिता ६५ सावधानता ४७
संकुचितशक्ति ७५ स्थाप्यते ६९
संकुचितचिक्छक्ति ६७ स्वात्मभावना ९०
संकोच ५३, ५४, ५५, ५६, ७९ स्वातन्त्र्य ४८, ५८, ६२, ६५, ७६,
संकोचकला ७७ ७८, ८०, ९४, ९५

( ११ )
स्वात्मदेवता ४४ स्वेच्छया ४८
स्वानुभव ४४ स्वेच्छावगृहीत ६०
सिद्धिः ४७ सौगत ६०
सिद्धान्त ६० सृज्यते ६९
सिद्धौ ४६ सृष्टि ६४, ६७, ७१, ७३, ९४
स्थिति ६५, ७२ सृष्टिपदे ६९
स्थितिदेव्या ६९
ह
सुकुमारमति ४४ हकला ९५
सुख ४४, ४७, ४८, ५५, ६०, ६३, हठपाक ७०
९६, ९९ हृदय ८८, ८९
सुषुप्त ७५ हृद्याकाश ८९
स्फुरति ४५, ५१, ५६ हेतु ४४, ४५, ४६
स्फुरन्ती ६४ हेतुहेतुमद्भाव ४५

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शुद्धिपत्र
पृष्ठ पंक्ति (ऊपर से) अशुद्ध शुद्ध
४ ४ सिद्दान्त सिद्धान्त
६ ११ प्रत्यभिक्षा प्रत्यभिज्ञा
११ १९ सृष्टि और संसार सृष्टि और संहार
१२ ७ अस्फुटत्सात अस्फुटत्वात्
१२ २६ वैद्य वेद्य
१३ १० अहम अहम्
१३ २२ पांच पाँच
१४ ४ पांच पाँच
१४ २० कंचकों कंचुकों
१७ १४ अनपह्नवनवनीयः अनपह्नवनीयः
२३ २३ शंकरवेदान्त शांकरवेदान्त
२४ ३१ होगा होता
३१ २२ संस्कृति संसृति
३५ ५ प्रभाता प्रमाता
३८ २५ अविर्भाव आविर्भाव
४३ ३ प्रत्याभिज्ञाहृदय प्रत्यभिज्ञाहृदय १
४५ ८ स्फरति स्फुरति
४७ २४ ज्ञाता का उदय ज्ञान का उदय
५३ २२ अन्यत्र कहा है अन्यत्र कहा है ७
५७ १४ अनुसप अनुभव
५९ पादटिप्पणी शिवप्रमाता १-शिवप्रमाता
६५ १६ भक्तों की भक्तों को
६५ २२ वह शक्ति वह अपने शक्ति
७० ७ व्यामोहित्वं व्यामोहितत्वं
७५ १७ चिदानन्दघनमय १२६ चिदानन्दघनमय
व्यानशक्ति ब्यानशक्ति १२६
७६ ५ शिप शिव
८१ २४ दृढ़ता ही दृढ़ता हो
८९ २३ चित्तधृत्ति चित्तवृत्ति
९० ११ विस्नार विस्तार
९२ १३ भीतरस्थिति भीतरस्थित

( १४ )
९६ ८ महामन्व महामन्त्र
९६ २६ इस सत्र में इस सब में
१०५ १३ जाव जीव
११० २१ प्रमाण प्रमा
११६ ३० विवृत्ति विवृति
१२१ २५ ही पाता हो पाता
१२३ २१ माव्या माया
१२५ २३ जीव की जीव को
१२८ २१ २२१ १२१
१४० ३ 'अ' लेकर 'अ' से लेकर
१४० ३० अपने की अपने को
१४८ ३ Note No. 167 Note No. 174
१५० १४ प्रभा प्रमा
१५१ २१ हारन्ध्र ब्रह्मरन्ध्र

अकारादिक्रम से सूत्रों की अनुक्रमणिका
सूत्र सूत्रांक पृष्ठांक
आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापनतस्तानि । ११ ६९
चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । ५ ५४
चितिवह्निरवरोहपदेच्छन्नोऽपि मात्रया मेयन्धनं प्लुष्यति । १४ ७७
चितिसंकोचात्मा चेतनोऽपि संकुचितविश्वमयः । ४ ५१
चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः । १ ४४
चिदानन्दलाभे देहादिषुचेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्ति-
दार्ढ्यञ्जीवन्मुक्तिः । १६ ८१
चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृतः संसारी ९ ६५
तत्परिज्ञाने चित्तमेवान्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्यारोहाच्चितिः । १३ ७६
तथापि तद्वत्पञ्चकृत्यानि करोति । १० ६७
तदपरिज्ञाने स्वशक्तिभिर्व्यामोहितता संसारित्वम् । १२ ७०
तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णाहन्तावेशात्
सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिजसंविद्देवताचक्रेश्वरता प्राप्तिर्भवति । २० ९३
तद्भूमिकाः सर्वदर्शनस्थितयः । ८ ५९
तन्नाना अनुरूपग्राह्यग्राहकभेदात् । ३ ४९
तन्मयो मायाप्रमाता ६ ५६
बललाभे विश्वमात्मसात्करोति । १५ ७९
मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः । १७ ८२
विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकास-वाहच्छेदाद्यन्त-कोटिनिभालनादय
इहोपायाः । १८ ८३
स चैको द्विरूपस्त्रिमयश्चतुरात्मा सप्तपञ्चकस्वभावः । ७ ५८
समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयोभूयश्चिदैक्यामर्शात् १९ ९१
नित्योदित समाधिलाभः ।
स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । २ ४८

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योगप्रदीपिका
स्वात्माराम योगी
ब्रह्मचारि याज्ञवल्क्य प्रणीत हिन्दी भाष्य सहित
श्री आदिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, आनन्दभैरव आदि हठयोग
प्रवर्तक आचार्यों में प्रस्तुत कृति के रचयिता स्वात्माराम योगी का नाम
विख्यात है ।
पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार आत्मदर्शन के लिये राजयोग चरम
साधन है । किन्तु राजयोग की प्राप्ति के लिये हठयोग की साधनायें आवश्यक
हैं । योगसाधना के अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग साधनों में हठयोग का बहिरङ्ग
में समावेश हो जाता है ।
प्रस्तुत पुस्तक चार उपदेशों में विभक्त है । प्रथम उपदेश में वीर, कूर्म
आदि योगासनों का विवरण है । द्वितीय उपदेश में प्राणायाम के विविध प्रकार
हैं । तृतीय उपदेश में कुण्डलिनी जागरणार्थ महामुद्राओं की विधि है । चतुर्थ
उपदेश में शांभवी, उन्मनी, खेचरी आदि महामुद्राओं के साथ-साथ नादावस्था
आदि योग-सामग्री का संग्रह है । मूल्य रु० ३.५०
भारतीय दर्शनशास्त्र—न्याय वैशेषिक
डा० धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री
प्रस्तुत कृति में भारतीय दर्शनशास्त्र के और विशेषतः न्याय-वैशेषिक
शास्त्र के इतिहास और सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन किया गया है । इस पुस्तक
के तीन प्रकरण हैं । पहले प्रकरण में भारतीय दार्शनिक सम्प्रदाय के अन्तर्गत
वैदिक, बौद्ध, जैन, चार्वाक, मीमांसा, वेदान्त और सांख्य दर्शन के सिद्धान्तों का
वर्णन है । दूसरे प्रकरण में प्रारम्भिक युग से लेकर नवीन युग तक न्याय-वैशेषिक
के इतिहास का विवेचन है । तीसरे प्रकरण में न्याय वैशेषिक दर्शन सिद्धान्तों
का निरूपण है । कृति आलोचनात्मक है; दर्शन शास्त्र के छात्रों के लिये अत्यन्त
उपयोगी है । मूल्य रु० ३.००
भारतीय दर्शन की भूमिका
डा० रामचन्द्र पाण्डेय
इस कृति में मनीषी लेखक ने भारतीय दर्शन के प्रारम्भिक छात्रों के लिये
भारतीय दर्शन शास्त्र का सरल और सुगम विवेचन प्रस्तुत किया है । यह कृति
उन लोगों को दृष्टि में रखकर लिखी गई है जो भारतीय दर्शन के सिद्धान्तों
से पूर्व परिचित नहीं हैं । लेखक ने पन्द्रह अध्यायों में भारतीय दर्शन के
उद्गम से लेकर धर्मनिरपेक्षता और प्रजातन्त्र के आधुनिक सिद्धान्तों तक का
स्पष्ट शैली में दार्शनिक समीक्षण प्रस्तुत करते हुए यह दिखलाया है कि मूल रूप में
भारतीय दर्शन स्वतंत्रता की खोज है और इसका चरम लक्ष्य “धर्मों का
गणतन्त्र” स्थापित करना है । मूल्य रु० १०.००
मोतीलाल बनारसीदास
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