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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

३. तृतीय भाग (सूत्र १३-१६): शक्ति-विकास, मध्य-विकास एवं उन्मना दशा

६६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
इति। एषैव च अहन्ता सर्वमन्त्राणाम् उदयविश्रान्तिस्थानत्वात्
एतद्बलेनैव च तत्तदर्थक्रियाकारित्वात् महती वीर्यभूमिः। तदुक्तम्
'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा... ...।'
इत्यादि
.... त एते शिवधर्मिणः ॥'
इत्यन्तम् श्रीस्पन्दे। शिवसूत्रेषु अपि
'महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभवः, (१उ० २२ सू०)
इति। तदत्र महामन्त्रवीर्यात्मिकायां पूर्णाहन्तायाम् 'आवेशो'--देह-
प्राणादिनिमज्जनात् तत्पदावाप्त्यवष्टम्भेन देहादीनां नीलादीनामपि
तद्रसाप्लावनेन तन्मयीकरणम्। तथा हि--देहसुखनीलादि यत् किंचित्
प्रथते, अध्यवसीयते, स्मर्यते, संकल्प्यते वा, तत्र सर्वत्रैव भगवती
चितिशक्तिमयी प्रथा भित्तिभूतैव स्फुरति;--तदस्फुरणे कस्यापि अस्फु-
श्री स्पन्दकारिका में कहा गया है (स्प० का० द्वि० नि० १, १)
“इसी बल को पहुँच कर" यहाँ से लेकर वे “सब शिवात्मक हैं" यहाँ
तक।
शिव सूत्र में भी कहा गया है :-
“यही वह महासरोवर१८४ है जिससे सम्बन्ध स्थापित करने१८५ से
मंत्रशक्ति का अनुभव होता है।" (१ उ०, २२ सूत्र) [यहाँ तक सूत्र के
“प्रकाशानन्दसार” अंश पर भाष्य है। अब “महामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णाहन्ता-
वेशात्” इ० अंश पर भाष्य प्रारम्भ होता है]। यहाँ पर (इस सूत्र में)
महामन्त्रशक्तिरूपी पूर्ण अहन्ता में आवेश कहने का तात्पर्य है 'देहप्राण
इत्यादि के उसमें निमज्जन से अर्थात् उस पद की प्राप्ति की स्थिरता से देह,
नील इत्यादि वेद्यों (ज्ञेयों) को उसके (पूर्ण अहन्ता के) रस में निमग्न कर
तन्मय कर देना।' देह, सुख नील इत्यादि जो कुछ प्रकाश में आ रहा है,
अथवा जो कुछ (बुद्धि के द्वारा) निश्चय किया जा रहा है, (मन के द्वारा)
स्मरण किया जा रहा है अथवा संकल्प किया जा रहा है—इस सत्र में भगवती
चितिशक्ति का प्रकाश पृष्ठभूमि होकर स्फुरण करता रहता है। यह ठीक ही
कहा गया है कि बिना उसके (चितिशक्ति के) स्फुरण के कुछ भी प्रकाश में

७ प्रत्यभिज्ञाहृदय ६७
रणात् इति उक्तत्वात् । केवलं तथा स्फुरन्त्यपि सा तन्मायाशक्त्या
अवभासितदेहनीलाद्युपरागदत्ताभिमानवशात् भिन्न-भिन्नस्वभावा इव
भान्ती ज्ञानसंकल्पाध्यवसायादिरूपतया मायाप्रमातृभिः अभिमन्यते;
वस्तुतस्तु एकैव असौ चितिशक्तिः । यथोक्तम्
'या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता ।
अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥'
इति । तथा
'मायाशक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा ।
कथिता ज्ञानसंकल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥'
इति । एवम् एषा सर्वदशासु एकैव चितिशक्तिः विजृम्भमाणा यदि
तदनुप्रवेश- तदवष्टम्भयुक्त्या समासाद्यते, तत् तदावेशात् पूर्वोक्तयुक्त्या
करणोन्मीलननिमीलनक्रमेण सर्वस्य सर्वमयत्वात् तत्तत्संहारादौ अपि
नहीं आ सकता है। केवल इस प्रकार से स्फुरण करती हुई भी वह अपनी
मायाशक्ति द्वारा जो देह, नील इत्यादि भासित हो रहे हैं उनके प्रभाव से
वैसे ही मान बैठने के कारण भिन्न-भिन्न स्वभाववाली प्रकाशित होती हुई
मायाप्रमाताओं (जीवों) के द्वारा ज्ञान, संकल्प, निश्चय इत्यादि रूप में समझी
जाती है। वस्तुतः यह चितिशक्ति एक ही है। जैसा कि कहा गया है—"
"यह जो संविद् भिन्न-भिन्न पदार्थों के क्रम से रञ्जित है वह (वस्तुतः)
क्रम रहित (कालरहित) अनन्त (देशरहित) चित् रूप श्रेष्ठ प्रमाता महेश्वर
ही है।" (ई० प्र० ज्ञानाधिकरण, ७ आ० १)।
वैसे ही (उसी भाव का निम्नलिखित श्लोक भी है)
"प्रभु की मायाशक्ति के द्वारा, वही (चित् शक्ति ही) जिसके भिन्न-भिन्न
ज्ञेय विषय हैं, ज्ञान, संकल्प, अध्यवसाय (निश्चय) इत्यादि नामों से कही
जाती है।"
इस प्रकार सभी दशाओं में वही एक ही चित् शक्ति है जो प्रकट होती
हुई यदि अनुप्रवेश और स्थिरता की युक्ति से (जिसका वर्णन अठारहवें सूत्र
में हो चुका है) उपलब्ध होती है, तब उसमें प्रवेश होने से पूर्व कथित युक्ति
से, इन्द्रियों के उन्मीलन (खोलने) और निमीलन (बन्द करने) के क्रम से—
सब कुछ सर्वमय होने के कारण-सब के संहार इत्यादि में भी—सदासृष्टि और

६८ प्रत्यभिज्ञाहृदय

'सदा सर्वसर्गसंहारकारि' यत् 'सहजसंवित्तिदेवताचक्रम्'--अमायो-
यान्तर्बहिष्करणमरीचिपुञ्जः, तत्र 'ईश्वरता'--साम्राज्यं परभैरवा-
त्मता, तत्प्राप्तिः भवति परमयोगिनः । यथोक्तम्
'यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ ।
नियच्छन्भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥'
इति । अत्र एकत्र इति
'एकत्रारोपयेत्सर्वम्... ...।'
इति । चित्सामान्यस्पन्दभूः उन्मेषात्मा व्याख्यातव्या । तस्य इति
अनेन
'पुर्यष्टकेन संरुद्ध... ...।'
इति उपक्रान्तं पुर्यष्टकम् एव पराम्रष्टव्यम्; न तु यथा विवरणकृतः
'एकत्र सूक्ष्मे स्थूले शरीरे वा' इति व्याकृतवन्तः । स्तुतं च मया

संहार करनेवाला जो स्वाभाविक ज्ञानरूपी देवता का समूह है अर्थात् जो
कुछ भी अमायीय आन्तर और बाह्य इन्द्रियों का प्रभापुञ्ज है उस सब पर
परम योगी को ईश्वरता अर्थात् साम्राज्य या परभैरवात्मता प्राप्त हो जाती
है । जैसा कि कहा गया है ।
"जब कोई एक ही स्थान में (अर्थात् पूर्णाहन्ता के स्पन्दतत्त्व में) समाविष्ट
हो जाता है, तब उसके (अर्थात् पुर्यष्टक के और निमीलन और उन्मीलन
समावेश से उसके द्वारा विश्व का भी) लय (संहार) और उद्भव (सर्ग) को
वश में करता हुआ (वास्तविक) भोक्तृता को प्राप्त होता है और चक्र (इंद्रिय
देवताओं के समूह) का अधिपति हो जाता है।" (स्प० का० ३, १६) ।
यहाँ पर 'एकत्र' निम्नलिखित कारिका में समझाया गया है । "एकत्र
(एक ही स्थान में) सब कुछ स्थापित करना चाहिए" (स्प० का० ३, १२) ।
इसमें 'एकत्र' की व्याख्या करनी चाहिए "चित् का सामान्यस्पन्द उन्मेष-
स्वरूप" । 'तस्य' अर्थात् 'उसके' से 'पुर्यष्टक' ही समझना चाहिए क्योंकि
इसके पूर्व में कहा गया है "पुर्यष्टकेन संरुद्ध" (स्प० का० ३, १७) (अर्थात्
पुर्यष्टक से आबद्ध) । इसको वैसा नहीं समझना चाहिए जैसा कि विवरण-
कार१८६ ने व्याख्या की है "एकत्र अर्थात् सूक्ष्म या स्थूल शरीर में।" जैसा
कि मैंने एक स्तुति में कहा है :-

प्रत्यभिज्ञाहृदय ०६६
'स्वतन्त्रश्चितिचक्राणां चक्रवर्ती महेश्वरः।
संवित्तिदेवताचक्रजुष्टः कोऽपि जयत्यसौ ॥'
इति। इतिशब्द उपसंहारे, यत् एतावत् उक्तप्रकरणशरीरं तत् सर्वं
‘शिवम्'--शिवप्राप्तिहेतुत्वात् शिवात् प्रसृतत्वात् शिवस्वरूपाभिन्नत्वात्
च शिवममयमेव इति शिवम् ॥
देहप्राणसुखादिभिः प्रतिकलं संरुध्यमानो जनः
पूर्णानन्दघनामिमां न चिनुते माहेश्वरीं स्वां चितिम् ।
मध्येबोधसुधाब्धि विश्वमभितस्तत्फेनपिण्डोपमं
यः पश्येदुपदेशतस्तु कथितः साक्षात्स एकः शिवः ॥
येषां वृत्तः शांकरः शक्तिपातो
येऽनभ्यासात्तीक्ष्णयुक्तिष्वयोग्याः।
“जो अन्तः और बाह्य इन्द्रियों की अधिशासी संवित् शक्ति के समूह१८७ से
सेवित होता हुआ चितिचक्र का स्वतन्त्र चक्रवर्ती सम्राट्१८८ और महेश्वर हो
जाता है ऐसा बिरला व्यक्ति (वास्तविक) जय लाभ करता है।”
सूत्र में जो ‘इतिशिवम्’ पद आया है उसमें ‘इति’ शब्द उपसंहार के
अर्थ में प्रयुक्त हुआ है—और शिव शब्द का भाव यह हैं कि इस छोटे ग्रन्थ
(प्रकरण) का जो शरीर है (अर्थात् इस छोटे से ग्रंथ में जो कुछ कहा गया
है) वह सब शिव हैं अर्थात् शिव की प्राप्ति का साधन है, और वह सब
इसलिए भी शिव हैं क्योंकि वह शिव द्वारा विस्तृत रूप से कहा गया है,
शिवस्वरूप से अभिन्न है और शिव ही है ।
“देह प्राण, सुख इत्यादि से प्रतिक्षण घिरा हुआ मनुष्य अपनी इस चिति
को जो महेश्वर स्वरूप है, जो पूर्ण आनन्दघन है नहीं पहचानता । किन्तु जो
इस उपदेश से ज्ञानरूपी अमृत समुद्र में विश्व को चारों ओर उसके फेनपिण्ड
के समान देखता है वह साक्षात् शिव ही कहा जाता है।
जिनमें शंकर का शक्तिपात हो गया है किन्तु जो अभ्यास न होने के
कारण प्रखर तार्किक चिन्तन में असमर्थ हैं और इसलिए ईश्वर प्रत्यभिज्ञा

१०० प्रत्यभिज्ञाहृदय
शक्ता ज्ञातुं नेश्वरप्रत्यभिज्ञा-
मुक्तस्तेषामेष तत्त्वोपदेशः ॥
समाप्तमिदं प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ॥
कृतिस्तत्रभवन्महामाहेश्वराचार्यवर्यश्रीमदभिनवगुप्तपादपद्मोपजीविनः
श्रीमतो राजानकक्षेमराजाचार्यस्य ॥
शुभमस्तु ॥
(उत्पलदेव द्वारा लिखा हुआ ईश्वर प्रत्यभिज्ञाग्रंथ) नहीं समझ सकते उनके
लिए यह तत्व का उपदेश (प्रत्याभिज्ञाहृदयम् नामक ग्रंथ द्वारा) कहा गया है।
यह प्रत्याभिज्ञाहृदयम् ग्रंथ समाप्त ही गया है। यह पूज्य महामाहेश्वरा-
चार्यवर्य श्रीमान् अभिनवगुप्त के चरणकमल पर आश्रित श्रीमान् राजानक
क्षेमराजाचार्य की कृति है। (सब का) कल्याण हो।

टिप्पणियाँ
१. प्रत्यभिज्ञा :—'प्रत्यभिज्ञा' शब्द का अर्थ है पहचान । किसकी
पहचान ? अपने स्वरूप की। यह शास्त्र यह बतलाता है कि जीव शिव ही
है। व्यष्टि और समष्टि का आत्मा एक ही है।
संसार में आकर जीव अपने सच्चे स्वरूप को भूल जाता है और अपने
स्थूल और सूक्ष्म देह ही को समझ बैठता है कि यह मैं हूँ । यह शास्त्र अपने
सच्चे स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) करवाता है । इसलिए इसे
प्रत्यभिज्ञादर्शन या प्रत्यभिज्ञा-शास्त्र कहते हैं ।
अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी में 'प्रत्यभिज्ञा' की निम्नलिखित
विशद व्याख्या प्रस्तुत की है।
'प्रतीपमात्माभिमुख्येन ज्ञानं प्रकाशः प्रत्यभिज्ञा । प्रतीपम् इति स्वात्माव-
भासो हि न अननुभूतपूर्वोऽविच्छिन्नप्रकाशत्वात् तस्य, स तु तच्छक्त्यैव
विच्छिन्न इव विकल्पित इव लक्ष्यते-इति वक्ष्यते । प्रत्यभिज्ञा च भातभासमान-
रूपानुसंधानात्मिका, स एवायं चैत्र-इति प्रतिसंधानेन अभिमुखीभूते वस्तुनि
ज्ञानम्; लोकेऽपि एतत्पुत्र एवंगुण एवं रूपक इत्येवं वा; अन्ततोऽपि
सामान्यात्मना वा ज्ञातस्य पुनरभिमुखीभावावसरे प्रतिसंधितप्राणितमेव ज्ञानं
प्रत्यभिज्ञा-इति व्यवह्रियते; नृपतिंप्रति प्रत्याभिज्ञापितोऽयम् - इत्यादौ ।
इहापि प्रसिद्धपुराणसिद्धान्तागमानुमानादिविदितपूर्णशक्तिस्वभावे ईश्वरे,
सति स्वात्मन्यभिमुखीभूते तत्प्रतिसंधानेन ज्ञानम् उदेति, नूनं स एव ईश्वरोऽ
हम्-इति ।'
अर्थात् प्रत्यभिज्ञा' शब्द प्रति+अभि+ज्ञा से बना हुआ है। प्रति का
अर्थ है 'प्रतीप' (प्रतिकूल, विपरीत); अभि का अर्थ है अभिमुख रूप से
अर्थात् आमनेसामने, स्फुटरूप से, स्पष्टरूप से; ज्ञा का अर्थ है ज्ञान या प्रकाश
ज्ञात होने पर भी विस्मृत तत्त्व का अभिमुख रूप से ज्ञान या प्रकाश' प्रत्यभिज्ञा
है ।' 'प्रतीपम्' का भाव यह है कि अपने आत्मा का पूर्व में अवभास न हुआ
हो ऐसा नहीं है, क्योंकि वह अविच्छिन्न रूप से प्रकाशित रहनेवाला तत्त्व है,
किन्तु वह अपनी ही ( स्वातंत्र्य ) शक्ति से हटा हुआ जैसा, विभक्त हुआ
जैसा जान पड़ता है - यह आगे बतलाया जायगा ।

१०२ प्रत्यभिज्ञाहृदय
प्रत्यभिज्ञा का तात्पर्य है' पूर्व में भात (ज्ञात) का वर्तमान में भास-
मान (प्रतीत होता हुआ) के साथ एकीकरण, जैसे 'यह' (वर्तमान में
भासमान) 'वही' (पूर्व में ज्ञात) चैत्र है। दूसरे शब्दों में पूर्व में अनुभूत
वस्तु का अभिमुख (सामने) होने पर प्रतिसंधान अर्थात् अनुस्मरण के
बल से ज्ञान होना प्रत्यभिज्ञा है। लोक में भी 'इसका पुत्र इस प्रकार के
गुणवाला', 'इस प्रकार के रूपवाला' इसी प्रकार का ज्ञान है। अथवा सामान्य-
रूप से ज्ञात वस्तु का फिर सामने होने के अवसर पर अनुस्मरण द्वारा ज्ञान
ही प्रत्यभिज्ञा है ऐसा व्यवहार में पाया जाता है। 'राजा के प्रति इसका पहि-
चान कराया गया' इत्यादि में भी 'प्रत्यभिज्ञा' का व्यवहार देखा जाता है।
इस प्रसंग में भी प्रसिद्ध पुराण, सिद्धान्त, आगम, अनुमान इत्यादि के
द्वारा पूर्ण शक्ति के स्वभाव वाले ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होने पर, अपने
आत्मा का स्फुटरूप से साक्षात्कार होने से प्रतिसन्धान (अनुस्मरण) के बल
से दोनों ज्ञान के एकीकरण द्वारा जो यह ज्ञान उदय होता है कि निश्चित रूप
से 'मैं वही ईश्वर हूँ' 'प्रत्यभिज्ञा' है। इस ग्रन्थ में क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञा-
दर्शन का मर्म बतलाया है। इसीलिए उन्होंने इसका नाम रखा है
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।'
इस शास्त्र का यही संदेश है कि यदि कोई अपने सच्चे आत्मा को पहचान ले
तो शरीर इत्यादि अनात्मा में जो आत्मबुद्धि है उससे वह छुटकारा पा जायगा
और यह समझ लेगा कि उसका वास्तविक आत्मा विश्वात्मा शिव ही है।
इस शास्त्र का दूसरा नाम है त्रिकदर्शन। 'त्रिक' का अर्थ है 'तीन का
समूह'। वे तीन निम्नलिखित हैं :-
(१) नर अर्थात् बद्ध जीव (२) शक्ति-शिव का तेज या पराक्रम,
और (३) शिव जो नित्य पंचकृत्य करते रहते हैं।
इसका तीसरा नाम स्पन्दशास्त्र है। स्पन्द का अर्थ हैं क्रियाशीलता।
इसको स्पन्दशास्त्र इसलिए कहते हैं क्योंकि शिव या शक्ति की क्रियाशीलता
के कारण ही जगत् का अस्तित्व है।
२. शिव-इस शब्द की दो प्रकार से व्युत्पत्ति हो सकती है-(क)
अदादिगण के 'शी' धातु से जिसका अर्थ होता है 'शयन करना'। जिसमें सब
कुछ शयन करता है वह शिव है। (ख) दिवादिगण के 'शो' धातु से जिसका
अर्थ होता है दुर्बल कर देना। जो सब दुःखों और पापों को दुर्बलकर देता
है, वह शिव है। ये दोनों अर्थ 'शिव' शब्द में निहित हैं। शिव सब सृष्टि
का अधिष्ठान है और वह परम कल्याणकारी भी है जो अपने अनुग्रह से सब

टिप्पणियाँ १०३
जीवों का उद्धार करता है। वह तात्त्विक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से
सबका मूल है। भोग भी उसी से होता है, और मोक्ष भी उसी से होता है।
प्रत्यभिज्ञा, त्रिक और स्पन्द शास्त्र के अतिरिक्त इसका नाम 'शैवदर्शन'
या 'भैरवदर्शन' भी है। इसका शैव या भैरवदर्शन इसलिए नाम पड़ा क्योंकि
यह शिव या भैरव को ही सारी सत्ता का मूल मानता है।
यह अद्वैत दर्शन है। दक्षिण के शैवदर्शन से (जो कि द्वैत हैं) पृथक्
करनेके लिए इसे कश्मीर का शैवदर्शन भी कहते हैं।
३. सततम् - 'सततम्' का अन्वय 'नमः' अथवा 'पञ्चकृत्यविधायिने',
दोनोंके साथ हो सकता है। सततम् नमः का अर्थ होगा शिवको मेरा बराबर
नमस्कार है। सततम् पञ्चकृत्यविधायिने का अर्थ होगा जो नित्य (बराबर)
पञ्चकृत्य का करनेवाला है उसे (मेरा नमस्कार है)। दूसरा अन्वय अधिक
समीचीन है और इस शास्त्र की मूल दृष्टि से मिलता है।
४. पञ्चकृत्य--पाँच कार्य जो शिव सदा करता है निम्नलिखित हैं:-
(क) सृष्टि : यह शब्द सृज् धातु से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है
'अपने में से बाहर कर देना, छोड़ना, फेंकना, निकालना'। यह
बहुत ही व्यंजक शब्द है। इसके भीतर एक तात्त्विक दृष्टि
निहित है। सृष्टि का भाव यह है कि शिव के भीतर सब कुछ
है, वह केवल उसे बाहर फेंक देता है। सृष्टि शिव का वैभव है
जिसे वह बिखेर देता है। इससे यह भी ध्वनित होता है कि-
शिव जगत् का उपादान और निमित्त कारण दोनों है। वह एक
कुम्भकार के समान नहीं है जो कि यदि बाहर से मिट्टी मिलती
है, तब ही पात्र बना सकता है। उसकी शक्ति ही जगत्-रूप में
प्रकट होती है।
(ख) स्थिति : सृष्टि के अनन्तर जगत् का ठहराव और पालन।
(ग) संहार अथवा संहृति : इसका अर्थ है समेट लेना, बटोर लेना। जिसका
सर्जन किया था, जिसको बाहर फेंका था उसको पुनः समेट
लेना। संहार का अर्थ विनाश नहीं है। जो वस्तु व्यक्त थी वह
जब अव्यक्त हो जाती है तब ऐसा लगता है कि उसका विनाश
हो गया। अतः गौण रूप से उसे लोग विनाश कह लेते हैं, किन्तु
यह संहार का वास्तविक अर्थ नहीं है।
(घ) विलय, विधान, तिरोधान अथवा निग्रह-अपने सच्चे स्वरूप का
आवरण या गोपन कर देना।

१०४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
(ङ) अनुग्रह—स्वरूप का प्रकाश :
ये पांचों कृत्य शिव में स्वभावतः सदा होते रहते हैं । शिव अपने भीतर
से जगत् को बहिर्मुख करता है (सृष्टि) उसे कुछ काल के लिए स्थित
रखता है (स्थिति), पुनः उसे अपने में समेट लेता है (संहार) । इन तीनों को
मिलाकर कल्प कहते हैं । यह सदा चलता रहता है । एक कल्प के अनन्तर
दूसरा प्रारम्भ होता है । ये तीनों कृत्य 'क्षेत्र' की दृष्टि से होते रहते हैं ।
तिरोभाव और आविर्भाव, निग्रह और अनुग्रह 'क्षेत्रज्ञ' की दृष्टि से होते
रहते हैं । वस्तुतः अनुग्रह या स्वरूप के पुनः प्रकाशन के लिए ही पूर्व के
चारों कृत्य होते रहते हैं ।
शिव अपने स्वातन्त्र्य से अपना गोपन करके जगत् में संसरण करता है
और पुनः अपना प्रकाशन करके अपने सच्चे स्वरूप में स्थित होता है । जीव
जब स्वदेश (शिव-स्थिति) से कुछ काल के लिए वियुक्त होकर विदेश (संसार)
में भ्रमण करके (प्रवृत्ति) पुनः स्वदेश में लौटता है (निवृत्ति) तब वह स्वदेश
के मूल्य को और अच्छी तरह से समझता है । अतः यह संसरण, यह प्रवृत्ति-
निवृत्ति का चक्र निरर्थक नहीं है ।
५. चिदानन्दधन—जो चित् और आनन्द का समूह है । इस शास्त्र में
सच्चिदानन्द का बहुत कम प्रयोग मिलता है । चिदानन्द का ही अधिक
प्रयोग मिलता है । कारण यह है कि अभिव्यक्ति को लेकर ही कुछ कह सुन
सकते हैं । चित् और आनन्द यही सत् की मुख्य अभिव्यक्ति है । अत एव
अभिव्यक्ति की दृष्टि से चिदानन्द का ही प्रयोग हुआ है। दूसरे सत् का स्वरूप
ही चित् और आनन्द है । अतः उसे अलग से कहने की आवश्यकता नहीं ।
६. 'स्वात्म' शब्द के दो भाव हैं (१) अपना स्वरूप (२) स्वकीय आत्मा ।
पहले भाव की दृष्टि से 'चिदानन्दधनस्वात्म-परमार्थविभासिने' का अर्थ है
जो परमार्थ को अवभासित करता रहता है जिसका स्वात्म या स्वरूप चिदा-
नन्दधन है । दूसरे भाव की दृष्टि से 'चिदानन्दधन स्वात्मपरमार्थविभासिने'
का अर्थ है' जो स्वकीय आत्मा (स्वात्म) को जो कि परमार्थ है और चिदा-
नन्दधन है अवभासित करता रहता है । इस शास्त्र की दृष्टि से दूसरा अर्थ
अधिक अच्छा है ।
७. परमार्थ—परम-सर्वोच्च, सर्वोत्तम । अर्थ शब्द के दो अर्थ हैं
(१) वस्तु और (२) इष्ट या लक्ष्य । परमार्थ से यह ध्वनित होता है कि
जो परम सत्ता या वस्तु है वही जीवन का परम लक्ष्य या इष्ट भी है ।

टिप्पणियां १०५
८. 'शाङ्कर'—शं करोति इति शंकरः जो कल्याण करता है वह 'शंकर'
है। यह शिव का दूसरा नाम है। 'शाङ्करोपनिषद्' का अर्थ है शिव
सम्बन्धी रहस्यशास्त्र अर्थात् शैवदर्शन ।
६. उपनिषद्—उप + नि + सद्—इसका शाब्दिक अर्थ है (आचार्य के)
पास अच्छी तरह बैठना । अर्थात् इस प्रकार बैठकर रहस्य-ज्ञान की प्राप्ति ।
शांकरोपनिषद् का अर्थ है शंकर सम्बन्धी रहस्यज्ञान । श्री शंकराचार्य ने
उपनिषद का अर्थ आत्मज्ञान द्वारा अविद्या का नाश भी किया है, किन्तु यहाँ
इसका अर्थ रहस्य या रहस्यज्ञान ही है।
१०. संसार—संसरति इति संसारः । जो स्थिर न हो, जो सदा सरकता
रहे, चलता रहे उसे संसार कहते हैं। संसार का अर्थ जीव का एक योनि
या अवस्था से दूसरो योनि या अवस्था में संसरण या भ्रमण करते रहना भी
है। यहाँ संसार शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। संसार जगत् रूप में विष
नहीं है, जाव के भ्रमण रूप में ही विष है।
विष शब्द जुहोत्यादिगण के 'विष्लृ' धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ
है व्याप्त होना । शरीर में व्याप्त होकर घातक होने के कारण इसे 'विष'
कहते हैं।
ऋचादिगण में भी एक विष धातु है जिसका अर्थ है विप्रयोग या वियोग
करना । संसार इस लिए भी विष है कि वह हमको शिव से वियुक्त कर
देता है ।
११. तर्कशास्त्र—हेतुपूर्णयुक्त और विवेचना के नियम को बतलाने
वाला शास्त्र ।
१२. समावेश—यह सम् + आ + विश् से बना है जिसका अर्थ है अच्छे
प्रकार से प्रवेश । पारमेश्वर समावेश का अर्थ है परमेश्वर के साथ जीव का
एकात्मभाव जिसमें वह अपने को शिव से अभिन्न समझता है । समावेश का
अर्थ शिव का जीव में प्रवेश कर उस पर छा जाना भी होता है। चाहे हम
शिव का जीव में प्रवेश या जीव का शिव में प्रवेश जो भी अर्थ लें दोनों का
परिणाम एक ही है जीव का शिव से एकात्मभाव ।
१३. शक्तिपात—शक्ति शिव का क्रियात्मक बल है। अतः वह शिव से
अभिन्न है। शक्ति से ही शिव पंचकृत्य करता है। शक्तिपात का अर्थ है
शक्ति का किसी पर गिरना अर्थात् शिव का अनुग्रह, शिष्य या साधक में गुरु
द्वारा या शिव द्वारा आत्मिक बल का उन्मेष ।

१०६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
१४. सूत्र—सूत, तागा, जो सूत के समान कुछ विचारों को एक साथ
ग्रथित किये रहता है। थोड़े से अक्षरों में कहा हुआ वचन जो बहुत अर्थ व्यक्त
करे 'सूत्र' कहलाता है। यहाँ सूत्र एक पारिभाषिक शब्द है। सूत्र का लक्षण
इस प्रकार कहा गया है—'स्वल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम् ।
अस्तोभमनवद्यं च सूत्रविदो विदुः' अर्थात् सूत्र के जानकार (उसको) सूत्र
मानते हैं जिसमें कम अक्षर हों, जिसमें (अर्थ के विषय में) कोई सन्देह न
हो, जो सारपूर्ण हो, जो सर्वत्र लागू हो, जिसमें व्यर्थ के शब्द न हों और
जो निर्दोष हो ।
१५. स्वतंत्रा--यह चिति का विशेषण है। 'स्वतंत्रा' का अर्थ है जो
स्व अर्थात् अपने ही ऊपर अवलम्बित है, किसी दूसरे से सहायता नहीं लेती,
जो सब बन्धनों से मुक्त है और जो सब कुछ सम्पादन करने में समर्थ है।
१६. चिति समष्टि वित् को कहते हैं। यह परासंवित् अर्थात् सर्वोत्कृष्ट
संवित् या शिव की शक्ति है। चिति समष्टि संवित् है। चित्त व्यष्टि संवित्
है। चित् शब्द प्रायः शिव के लिए प्रयुक्त होता है और चिति उसकी शक्ति
के लिए।
१७. 'सिद्धि' शब्द के कई अर्थ हैं जो कि इस सूत्र के भाष्य में बतलाये
गए हैं। मुख्यतः इसका अर्थ है सम्पादन अर्थात् काम का पूरा होना
विश्व की सिद्धि में विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार सभी अन्तर्भूत हैं।
१८. सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य—सदाशिव से लेकर पृथिवी तक। इस
दर्शन के अनुसार ३६ तत्व हैं। ये दो भागों में बाँटे जा सकते हैं (१) शुद्ध
अध्वा और (२) अशुद्ध अध्वा।
अध्वा का अर्थ है रास्ता, मार्ग, पद्धति, प्रकार, क्रम, काल। शिव की
अभिव्यक्ति का मार्ग या पद्धति जो माया से ऊपर है, जहाँ तक वेदक और
वेद्य में भेद नहीं है वहाँ तक शुद्ध अध्वा कहलाता है। जहाँ से भेद प्रारम्भ
होता है वहाँ से लेकर भूमि तक अशुद्ध अध्वा कहलाता है।
शिव से लेकर अवरोही क्रम में ३६ तत्त्व इस प्रकार हैं।
१. शिवः—यह सर्वोत्कृष्ट तत्त्व है। यह समष्टि चित् है। चित् ही
इसका स्वरूप है।
२. शक्तिः—शिव का अभिन्न चिन्मय सामर्थ्य या स्वातंत्र्य। इसमें
आनन्द का प्राधान्य है।
ये दोनों तत्त्व सभी अभिव्यक्ति के मूल हैं और एक प्रकार
से अभिव्यक्ति से परे हैं।

टिप्पणियाँ १०७
शुद्ध अध्वा अथवा अतिजागतिक अभिव्यक्ति
३. सदाशिवः-- इस तत्त्व में अहन्ता और इच्छा का प्राधान्य रहता
है। इदन्ता या विश्व अभी अस्फुट अवस्था में है। इसका
दूसरा नाम सादाख्य तत्त्व भी है। इसका परामर्श है 'अहमिदम्'
मैं यह (विश्व) हूं। इस अवस्था में 'मैं' और 'विश्व' में
कोई भेद नहीं है। अभी विश्व स्फुट हुआ ही नहीं है।
सादाख्य का अर्थ है 'सत् आख्या यतः'–वह अवस्था जहाँ
सबसे पहले सत्ता का भान होता है।
४ ईश्वर :-इस तत्त्व में अहन्ता और इदन्ता, अहं का ज्ञान और
विश्व का आभास दोनों समान रूप से एक साथ ही स्फुट
रहता है। इसमें ज्ञान का प्राधान्य है। इसी से प्रनेय, या
ज्ञेय स्फुट रहता है। इसका परामर्श है 'इदमहम्'–यह
(विश्व) मैं हू । विश्व प्रमेय या वेद्य रूप में रहता है।
किन्तु 'अहम्' या 'मैं' से उसका अभेद रहता है।
५. विद्या या शुद्धविद्या या सद्विद्याः--इसमें क्रिया का प्राधान्य है।
इसका परामर्श है 'अहमिदं च अथवा इदं च अहं च'। अर्थात् मैं, मैं हूँ और
यह (विश्व) भी हू । यह भेदाभेद की अवस्था है अर्थात् भेद होने पर भी
उसमें अभेद का बोध बना रहता है। यद्यपि विश्व वेद्य या ज्ञेय रूप में भान
होता है, तथापि यह ज्ञान बना रहता है कि यह विश्व मैं ही हूँ। यह मेरा ही
रूप है, मुझ से भिन्न नहीं है। इसी से इसे शुद्ध विद्या कहते हैं, क्योंकि अभी
विश्व का अपने से भेद नहीं है।
शिव से शुद्धविद्या तक पाँच तत्त्व शुद्ध अध्वा कहलाते हैं। क्योंकि अभी
तक वेदक और वेद्य, प्रमाता और प्रमेय या ज्ञाता और ज्ञेय एकात्मक हैं
अर्थात् अभी तक वेद्य या ज्ञेय अपना ही रूप है और अभी तक पूर्ण रूपेण
स्वरूपगोपन नहीं हुआ है।
ये पाँचों तत्त्व चित् की सर्वगत अवस्था को व्यक्त करते हैं। यहाँ तक
वेद्य वेदक से भिन्न नहीं है; वेदक का वेद्य से अभेद बना हुआ है।
अशुद्ध अध्वा अथवा जागतिक अभिव्यक्ति
६. माया-विश्व निर्माणकारी या 'परिमितिकारीतत्त्व' ।
कभी-कभी यह तत्त्व कंचुकों में सम्मिलित नहीं किया जाता, क्योंकि
इसी से कंचुकों का प्रादुर्भाव होता है। माया स्वरूप का गोपन कर
देती है और भेद और नानात्व की जननी है।

१०८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
माया के पंच कंचुक (खोल)
७. कला—कर्तृत्व या साधकता का संकोच अथवा परिच्छिन्नत्व ।
८. विद्या—ज्ञातृत्व का संकोच अथवा ज्ञान का परिच्छिन्नत्व ।
९. राग—तृप्ति का संकोच अथवा परिच्छिन्नत्व जिसके कारण सदा
भिन्न भिन्न विषयों की चाह बनी रहती है ।
१०, काल—नित्यता का संकोच जिसके कारण भूत (अतीत), भवत्
(वर्तमान) और भविष्यत् का अलग अलग बोध होता रहता है और
जन्म-मरण होता रहता है ।
११. नियति—स्वातंत्र्य का संकोच जिसके कारण परिच्छिन्न देश कारण
इत्यादि का बोध होता है। नियति ही जीवको कृत्य और अकृत्य
में अवश बनाकर उसका नियमन करती रहती है ।
१२. पुरुष—जब शिव अपनी माया द्वारा आत्मगोपन करके परिमित
या परिच्छिन्न प्रमाता बन जाता है, तब उसको पुरुष कहते हैं । प्रमाता
वा पुरुष हो जाने पर शिव का सर्वकर्तृत्व कला में अर्थात् किंचित्-
कर्तृत्व में परिणत हो जाता है, उसका सर्वज्ञत्व विद्या (परिच्छिन्न ज्ञान)
में परिणत हो जाता है; उसका पूर्णत्व राग (भिन्न भिन्न विषय के
लिए अभिलाषों) में परिणत हो जाता है; उसका नित्यत्व काल (खण्ड
खण्ड समय) में परिणत हो जाता है; उसका व्यापकत्व नियति
(परिच्छिन्न देश, कारण इत्यादि) में परिणत हो जाता है । कला से
नियति तक माया के पांच कंचुक कहलाते हैं जो कि वे अवगुण्ठन या
परदे हैं जिनसे शिव अपने को ढक लेता है ।
१३. प्रकृतिः—बुद्धि से लेकर पृथिवी तक के प्रादुर्भाव की मूल योनि, प्रमेय
का मूल अधिष्ठान । इस दर्शन में प्रत्येक पुरुष के लिए भिन्न
भिन्न प्रकृति है ।
१४. बुद्धि—निश्चयात्मक ज्ञान की शक्ति ।
१५. अहंकार—अहं + कार अहम् (मैं) भाव को 'कार' करनेवाला या
प्रकट करनेवाला तत्त्व ।
१६. मनस् (मन) संकल्प विकल्प चित्त ।
१७-२१. पंच ज्ञानेन्द्रिय—पांच प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करनेवाली इन्द्रियां
( श्रवण, स्पर्श, दर्शन, रसन, गन्ध ) ।
२२-२६. पंच कर्मेन्द्रिया (वचन, ग्रहण, गमन, उत्सर्ग और जनन) ।

२७-३१. पंच तन्मात्र जी कि पांच ज्ञानेन्द्रियों की मूल योनि है—
१-शब्द तन्मात्र, २-स्पर्श तन्मात्र, ३-रूपतन्मात्र ।
४-रस-तन्मात्र, और ५-गन्धतन्मात्र ।
३२-३६. पंच महाभूत—आकाश, वायु, अग्नि, आपः (जल) और भूमि
या पृथ्वी ।
१६. परप्रमाता—सर्वोच्च ज्ञाता । प्रमाता का अर्थ है प्र + माता = प्रकृष्ट
रूप से—बहुत ही अच्छी तरह माप लेनेवाला अर्थात् जाननेवाला ।
परमशिव को पर प्रमाता कहते हैं ।
२०. पराशक्ति—सर्वोच्च शक्ति, मुख्यशक्ति । इसको परा (सर्वोच्च) इसलिए
कहते हैं क्योंकि इसकी सहकारी या गौणशक्तियाँ जगत् में व्याप्त
होकर भिन्न भिन्न कार्य सम्पन्न करती हैं। शक्ति का अर्थ है शिव
की चेतना या शिव चेतना का स्पन्द जो कि शिव से अभिन्न है। शिव
की ही अन्तः स्थित अर्थतत्व को बाहर प्रकट करने की उन्मुखता और
क्रियाशील अनुग्रह को शक्ति कहते हैं ।
२१. विमर्श—वि + मृश् । मृश् धातु का अर्थ है स्पर्श करना । मनसे
स्पर्श करना । यह इस दर्शन का एक उच्चकोटि का पारिभाषिक
शब्द है। परमशिव प्रकाशमात्र नहीं है, उसे अपने चैतन्य की भी
चेतना है। विमर्श परम सत् की शुद्ध आत्मचेतनता है। इसी
विमर्श या आत्मचेतनता के द्वारा ही सृष्टि, स्थिति और संहार
होता रहता है। इस विमर्श की तीन अवस्थाएं होती हैं। बाह्य
रूप में अर्थात् विश्व में प्रकट होना (सृष्टि) इस प्रथन या
प्रकटन को कायम रखना (स्थिति) और पुनः अपने आप में
वापिस आना (संहार) । इन तीनों अवस्थाओं के द्वारा सहज
अहम् (मैं या आत्मा) का विस्फुरण होता रहता है। द्रष्टव्य-
"इह खलु परमेश्वरः प्रकाशात्मा । प्रकाशश्चविमर्शस्वभावः । विमर्शो
नाम-विश्वाकारेण, विश्वप्रकाशनेन, विश्वसंहरणेन अकृत्रिमाहमिति
विस्फुरणम्" (पराप्रावेशिकाः पृ० १-२ कश्मीरसंस्कृत ग्रंथ माला ।)
परमशिव में समस्त विश्व उसी प्रकार विद्यमान रहता है जिस प्रकार
मयूर (मोर) के अण्डे के रस में चित्र-विचित्र पिच्छकलाप
(परों का समूह) विद्यमान रहता है। ( मयूराण्डरसन्यायेन ) ।
विमर्श आत्मचेतना का ही उपन्यास (बाहर प्रस्तुत करना) है, जिससे
आत्मचेतना की बाह्याभिव्यक्ति होती है ।

११४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
२२. शिवभट्टारक—भट्टारक, भट्टार और भट्ट शब्द समानार्थक हैं। यह
भट्ट शब्द भट् धातु में तन् प्रत्यय लगाकर बना है। भट् धातु
भ्वादिगणीय है। इसका अर्थ है पोषण करना (भट् = भृतौ)। भट्ट
का अर्थ है पोषणकरनेवाला, भर्ता, स्वामी। इसका प्रयोग राजाओं,
ब्राह्मणों और विद्वानों के लिए आदरप्रदर्शनार्थ होता है।
भट्टार—(भट्टं = स्वामित्वं ऋच्छति इति, ऋ-अण)। भट्टार वह है जो
स्वामित्व को प्राप्त हो अर्थात् जो स्वामी हो। भट्टारक में भट्टार
के ही अर्थ में 'क' प्रत्यय लगा है। भट्ट, भट्टार और भट्टारक तीनों
एक ही अर्थ के द्योतक हैं। भट्टारक का अर्थ है पूज्यस्वामी। यह शिव
के साथ आदरप्रदर्शन के लिए लगाया गया है।
२३. नित्योदित—उदित-उत् + इ + क्त से बना हुआ है। इसका शाब्दिक
अर्थ है 'ऊपर गया हुआ', 'उठा हुआ', 'उगा हुआ'। नित्योदित
का अर्थ है जिसका नित्यउदय है। संसार में जिसका उदय
होता है उसका अस्त भी होता है। इस प्रकार की उदित
वस्तु को शान्तोदित कहते हैं। किन्तु जिसका सदा उदय है
कभी अस्त होता ही नहीं, वह 'नित्योदित' है। चिति चित्-शक्ति है.
वह वह मूल चेतना है, जिसका कभी अस्त नहीं होता। चिति केलिए
केवल नित्य न कहकर नित्योदित (नित्य उगी हुई) कहने का तात्पर्य
यह भी हैं कि वह सदा क्रियाशीला है, उसमें सदा स्पन्द वर्तमान है।
२४. प्रमातृ—प्रमाता-विषयों का (चित्त द्वारा) माप कर लेनेवाला ज्ञाता।
२५—प्रमाण—माप अथवा ज्ञान और प्रमाण या ज्ञान का करण या साधन।
२६. प्रमेय—जो (चित्त द्वारा) माप लिया जाय; ज्ञेय; विषय। विश्वको
प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेय-मय कहने का भाव यही है कि समस्त विश्व इन्हीं
तीनों का पुञ्ज है। इसमें जो, विषय हैं वे प्रमेय या ज्ञेय हैं, इनको
जाननेवाले प्रमाता या जीव हैं और जाननेवालों का, प्रमाण (ज्ञान)
और उसका साधन है। इनके अतिरिक्त विश्व और कुछ नहीं है।
२७. बैन्दवीकला—पर प्रमाता। वेत्तीति 'विन्दुः'। बिन्दुः विद् धातु से निष्पन्न
हुआ है जिसका अर्थ होता है 'जानना'। विन्दु अथवा बिन्दु का
अर्थ है प्रमाता, ज्ञाता, वेदक। जो परम प्रमाता या संविद् है उसे
विन्दु या बिन्दु कहते हैं। 'बिन्दोरियमिति बैन्दवी'। 'बैन्दवी' का अर्थ
हुआ विन्दुसम्बन्धी 'कला' का अर्थ यहाँ शक्ति है। 'बैन्दवी कला' का
अर्थ हुआ 'आत्मसंवित्ति' (आत्मा की जानने) की शक्ति। यहाँ पर इस

टिप्पणियाँ १११
इसका अर्थ है आत्मा की वह शक्ति जिससे वह सदा अपने को वेदक के ही रूप
में जानता है। यहाँ पर सिर की उपमा आत्मा वा प्रमाता से दी गई है, और
पैर की उपमा प्रमाण से। जैसे अपने पैर से कोई अपने सिर की छाया को
नहीं लांघ सकता, वैसे ही प्रमाण प्रमाता को मापने या जानने में असमर्थ
है। स्वयं प्रमाण का अस्तित्व और सिद्धि प्रमाता के द्वारा है, तो प्रमाण
बेचारा प्रमाता के अस्तित्व को क्या सिद्ध करेगा। जिस प्रकार सिर की
छाया पैर द्वारा नहीं पकड़ में आ सकती, उसी प्रकार प्रमाता प्रमाण की पकड़
में नहीं आ सकता।
२८. सामरस्य—समरस अर्थात् एकरस का भाव। चित्शक्ति ही
स्वतंत्ररूप से अर्थात् बिना किसी अन्य की अपेक्षा किये हुए परप्रमाता परम
शिव से विश्व की सृष्टि द्वारा पृथक्त्व जैसी अवस्था निष्पन्न करती है, उस
अवस्था को कुछ काल तक स्थित रखती है और फिर संहार कर लेती है अर्थात्
विश्व को समेट कर उसी अद्वय परमशिव में समरस अर्थात् एकरूप कर देती है।
२९. स्वतन्त्र—चिति को स्वतंत्र इसलिए कहा है क्योंकि चाहे सृष्टि
हो, चाहे स्थिति, चाहे संहार—किसी के लिए भी वह दूसरे की अपेक्षा नहीं
करती। सब कुछ करने में वह स्वयं समर्थ है।
३०. भोगमोक्षरूपी विश्वसिद्धि—एक ऊँची दृष्टि से विश्वसिद्धि का अर्थ
भोग और मोक्ष की सिद्धि है। जब चित्शक्ति के स्वातंत्र्य की पहचान हो
जाती है तो वह भोग (वास्तविक स्वात्मचमत्कार रूपी भोग) और मोक्ष
दोनों की जननी हो जाती है।
३१. प्रमाणोपारोहक्रमेण—प्रमाण के आरोहक्रम से। यह आरोहक्रम इस
प्रकार है—प्रमेय को साधक प्रमाणरूप, ज्ञेय को ज्ञान रूप में जानने लगता है,
यह पहली सीढ़ी है, फिर प्रमाण को प्रमाता के रूप में, ज्ञान को ज्ञाता के रूप
में जानने लगता है। प्रमाण की विश्रान्ति प्रमाता में होती है। यही विमर्शमय
प्रमाता के साथ तादात्म्य है।
३२. ब्रह्मवाद से तात्पर्य है शांकर वेदान्त जिसमें चित् कर्तृत्व से हीन है
३३. कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे कोई नगर जो दर्पण में दिखलाई
देता है वस्तुतः दर्पण से अभिन्न है किन्तु भिन्न जैसा दिखलाई देता है वैसे ही
विश्व भी चित् से वस्तुतः अभिन्न है, किन्तु भिन्न जैसा प्रतीत होता है।
३४. सदाशिवतत्व—यह एक प्रकार से प्रथम अभिव्यक्ति है। शिव शक्ति
से सदाशिव अभिव्यक्त होता है जिसका परामर्श होता है 'अहमिदम्'—मैं यह

हूँ। इदम् अर्थात् यह अखिल विश्व का निर्देश करता है। अहं अर्थात् मैं
दिव्य प्रमाता सदाशिव का निर्देश करता है। यह सर्व व्यापी अहं (मैं) है।
जब परं की अभिव्यक्ति प्रारम्भ होती है तो उसका सर्वप्रथम परामर्श होता है
मैं यह हूँ (अहमिदम्) यह अर्थात् अखिल विश्व तो पहले से ही अव्यक्त रूप
से परं (परमेश्वर) की चेतना में निहित रहता है। किन्तु जब परमेश्वर
अपने को यह के रूप में प्रकट करता है, तो यही इस स्थूलरूप से व्यक्त होने
वाले विश्व की प्रथम झांकी है। यह वह अवस्था है जिसमें यह (इदम्) रूप
अस्फुट है और मैं (अहम्) रूप स्फुट है। इस अवस्था में विश्व अहन्ता (मैं) से
आच्छादित है, और उसका इदन्ता (यह) रूप अस्फुट है, जिसमें विश्व सदाशिव
से अभिन्न अर्थात् पर भी हैं और एक प्रकार से भिन्न अर्थात् अपर भी है।
इसी से विश्व को परापर (पर+अपर) कहा है 'मैं यह हूँ' इस परामर्श में 'होना'
(सत्) स्पष्ट है। यह सदाशिव का परामर्श है। इसलिए सदाशिवतत्व को
सादाख्य (सत्-होना) भी कहते हैं। इस तत्व में इच्छा प्रधान है।
इस दर्शन में प्रमाताओं का जो उच्चावचत्व (ऊँचा-नीचा स्तर) है उसे
अब बतलाते हैं। जिसने सदाशिवतत्व का साक्षात्कार कर लिया है वह प्रमाता
मंत्रमहेश्वर कहलाता है। वह अखिल विश्व से तादात्म्य अनुभव करता है।
३५. ईश्वरतत्व—अभिव्यक्ति का यह दूसरा स्तर है। इसमें 'मैं'
(अहन्ता) और 'यह' का परामर्श एक ही दर्जे का है अर्थात् दोनों का परामर्श
समान रूप से स्फुट है। विश्व जो कि 'पर' (परमशिव) की चेतना में अव्यक्त
रूप से निहित है, ईश्वर तत्व के स्तर पर यह (इदं) के रूप में सदा-
शिवतत्व की अपेक्षा अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त हो जाता है। ईश्वरतत्व में
ज्ञान प्रधान है। जिन्होंने ईश्वरतत्व का साक्षात्कार कर लिया है वे इस तत्व
में अवस्थित होते हैं। वे मंत्रेश्वर कहलाते हैं। ईश्वर तत्व का परामर्श है
'इदम् अहम्' (यह मैं हूँ) इसमें यह अर्थात् विश्व अस्फुट रूप में नहीं रहता परन्तु
उतना ही स्फुट हो जाता है जितना कि 'मैं'। इस अस्तर में 'मैं' और 'यह' की
चेतना समान रूप से स्फुट रहती है। फिर भी 'यह' अथवा विश्व का 'मैं' से
भिन्न बोध नहीं होता। सदाशिव और ईश्वर दोनों तत्वों में ग्राहक और ग्राह्य,
मैं और यह में भेद नहीं है। केवल सदाशिव तत्व में अहं अथवा मैं अधिक फुस्ट है
और इदं अथवा विश्व कम स्फुट है और ईश्वर तत्व में मैं और यह (विश्व) दोनों
समानरूप से स्फुट हैं। इस स्तर के प्रमाता 'मन्त्रेश्वर' के अधिष्ठाता ईश्वर हैं।
३६. विद्या या शुद्धविद्यातत्व—यह वह तत्व है जिसमें अहं (मैं) और
इदं (यह) दोनों का ज्ञान भिन्न होता है। यहाँ से भेद प्रारम्भ होता है,
किन्तु भेद के भीतर अभेद वर्तमान रहता है। इस तत्व में क्रिया प्रधान रहती है।

८ टिप्पणियाँ ११३
इस तत्त्व के प्रमाता 'मंत्र' कहलाते हैं जो कि भेद देखते हैं, किन्तु अभेद
में वह भेद भासित होता है। इन प्रमाताओं का अधिष्ठाता अनन्त
भट्टारक है। इस तत्त्व के प्रमाता का परामर्श होता है 'इदं च अहं च',
यह (विश्व) भी है और मैं भी हूँ, अर्थात् विश्व मुझसे भिन्न है, किन्तु
सर्वथा भिन्न नहीं है। 'यह' या विश्व 'मैं' से अलग प्रतीत होते हुए भी 'यह'
अथवा विश्व 'मैं' का ही एक प्रारूप है। 'यह' 'मैं' से सर्वथा भिन्न नहीं है।
इसी से इस स्थिति का ज्ञान 'शुद्ध-विद्या' है।
३७ विज्ञानाकल--शुद्ध विद्या से नीचे और माया से ऊपर विज्ञानाकल
की स्थिति है। विज्ञानाकल = विज्ञान + अकल-अर्थात् उसमें विज्ञान (बोध)
है, किन्तु कर्तृत्व नहीं है। पूर्व अवस्था में परिचित सकल और प्रलयाकल
ही उसके प्रमेयक्षेत्र हैं।
विज्ञानाकल उनसे अपना अभेद अनुभव करता है। इसमें से मायीय और
कार्ममल चले जाते हैं, केवल आणव मल रह जाता है।
३८. शून्यप्रमाता अथवा प्रलयाकल अथवा प्रलयकेवली-इसको स्पष्टरूप
से न अहं (मैं) का बोध होता है, न इदं (जगत्) का। जिस प्रकार सुषुप्ति में
शून्य जैसा भान होता है उसी प्रकार इसे शून्य का भान होता है जो कि
प्रायः कुछ नहीं के समान है। प्रलयाकल वह प्रमाता है जो संहार और सृष्टि
के बीच में प्रकृति से तादात्म्य रखता है। शून्यावस्था में पहुँचे हुए योगी भी
प्रलयाकल प्रमाता ही हैं।
प्रलयकाल में कला इत्यादि के विलीन हो जाने पर, नई सृष्टि के आरम्भ
होने तक प्रलयाकल मायातत्त्व के भीतर विद्यमान रहता है। इसमें आणव
और मायीय मल वर्तमान रहते हैं। कार्म मल चला जाता है।
३६. सकल--ये वे देव और जीव हैं जिन्हें सच्चा आत्मज्ञान नहीं होता
और जिनकी चेतना मुख्यतः भेद की होती है। ये आणव, मायीय और कार्म
तीनों मलों से आछन्न होते हैं।
४०--केवल प्रकाशरूप कहने का तात्पर्य यह है कि इस स्थिति में विमर्श
अस्फुट है, प्रकाश ही स्फुट है।
तीसरे सूत्र में प्रतिपादित विषय को हम एक सारणी में इस प्रकार रख
सकते हैं :--

प्रत्यभिज्ञाहृदय
११४
तत्त्व | अधिष्ठाता | प्रमाता | तदनुरूप प्रमेय
१. शिव तत्त्व | शिवभट्टारक | शिवप्रमाता | सब कुछ प्रकाशमय या शिवरूप ।
२. सदाशिव तत्त्व। इसमें इच्छा प्रधान है । | सदाशिवभट्टारक | मंत्रमहेश्वर जिसे अहं या शिव का भी स्फुट ज्ञान है किन्तु इदं या विश्व का भी अस्फुट रूप से ज्ञान है इस अवस्था में विश्व अपना ही एक रूप या भाव है। | इदन्ता या विश्व का अस्फुट ज्ञान जो आत्म बोध से भिन्न नहीं है ।.
३. ईश्वर तत्त्व । इसमें ज्ञान प्रधान है । | ईश्वरभट्टारक | मंत्रेश्वर जिसको ईश्वर के समान अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों का समान रूप से ज्ञान है किन्तु इदं या विश्व अहं से बाह्य या पृथक् नहीं है। | अहन्ता और इदन्ता दोनों का समान रूप से स्फुट ज्ञान । अभी विश्व आत्मा से सर्वथा बाह्य या पृथक् नहीं है ।
४. शुद्धविद्या तत्त्व या सद्विद्या तत्त्व । इसमें क्रिया प्रधान है । | अनन्तभट्टारक | मंत्र, जिसमें अहं और इदं दोनों भिन्न हो गये हैं किन्तु अभी अहं-संवित्ति से इदं पूर्णतया बाह्य और पृथक् नहीं हुआ है। | प्रत्येक वस्तु का भेदज्ञान होते हुए भी सबका आत्मा से सम्बन्ध का ज्ञान, आत्मा का ही रूप जान पड़ना ।
५. महामायातत्त्व (माया से ऊपर) | ✕ | विज्ञानाकल (इसमें केवल आणव मल है मायीय और कार्म मल चले गये हैं। बोध है, किन्तु कर्तृत्व नहीं है)। | पूर्व परिचित प्रलयाकलों और सकलों का ज्ञान ।
६. मायातत्त्व | ✕ | प्रलयाकल या प्रलयकेवली अथवा शून्यप्रमाता । इसमें से कार्ममल चला गया है किन्तु आणव और मायीय मल है। | शून्य
७. शेषतत्त्व पृथिवी तक | ✕ | सकल-देवों से लेकर वृक्षों और खनिज पदार्थों तक । इनमें आणव मायीय और कार्म तीनों मल वर्तमान हैं। | प्रत्येक वस्तु का एक दूसरे से भिन्न और अपने से भी भिन्न होने का ज्ञान ।

विज्ञानाकल से सकल तक कोई अधिष्ठाता नहीं है, क्योंकि विज्ञाना-
कल से महामाया का कार्य प्रारम्भ हो जाता है, और महामाया से अज्ञान
प्रारम्भ हो जाता है।
४१. अनाश्रितशिव—जब चिदैक्य ( जिसमें चित्त और विश्व एक ही
है ) का अपने स्वातंत्र्य से बोध हट जाता है तो उस अवस्था का नाम
अनाश्रितशिव है। यह शक्तितत्त्व और सदाशिव तत्त्व के बीच की अवस्था
है। यह ध्यान रहे कि यह अवस्था मात्र है, तत्त्व नहीं है। यह वह अवस्था
है जिसमें शक्ति आत्मा से विश्व का निषेध कर देती है और इस प्रकार
आत्मस्वरूप का आवरण हो जाता है जिसके कारण आत्मस्वरूप की अख्याति
अर्थात् अज्ञान हो जाता है। यह अख्याति शिव अपने स्वातंत्र्य से ही अपने
में उत्पन्न कर लेता है। उसकी शक्ति उसका स्वातंत्र्य है। शक्ति विश्व
का अहं ( शिव ) से निषेध कर देती है। इसलिए शक्ति को “स्वरूपरूपा-
पोहनात्माख्यातिमयी निषेधव्यापाररूपा” ( परमार्थसार० पृ० १० में ) कहा
है। पूर्ण अहं में अहं और विश्व एक है। विश्व का अहं से पृथक् हो
जाना अहं का अपूर्ण हो जाना है। विश्व का पुनः अहं से एकीभाव कर
लेना अपूर्ण अहं को पूर्ण बना लेना है। अहं का अपूर्ण हो जाना संसार है।
अहं का पुनः पूर्ण हो जाना मुक्ति है।
४२. शून्य से भी अधिक शून्य अर्थात् अत्यन्त शून्य। विश्व के निषेध
हो जाने के कारण, प्रमेय के सर्वथा अभाव के कारण इस अवस्था को
शून्यातिशून्य कहा है।
४३. त्रिशिरोमते—त्रिशिरोमत ग्रन्थ में तीन शिर वाले भैरव के रहस्य
का प्रतिपादन किया गया है। भैरव के तीन शिर शिव की तीन शक्तियों
परा, परापरा और अपरा—के प्रतीक हैं। परा वह स्थिति है जिसमें शिव और
शक्ति अभिन्न है। परापरा वह स्थिति है जिसमें भेद में अभेद है। अपरा
वह स्थिति है जिसमें ग्राहक और ग्राह्य में पूर्ण भेद है।
४४. सर्वदेवमयः कायः । विश्व एक ऐसा शरीर माना गया है जो कि
सभी देवों से बना है। सभी प्रमाता और प्रमेय देवरूप माने गये हैं। यही
प्रमाता—प्रमेय रूप विश्व प्रभु का शरीर है। एक दूसरा पाठ है सर्वतत्त्वमयः
कायः अर्थात् विश्वरूपी शरीर सभी तत्त्वों का बना हुआ है।
४५. प्रिये—आगमशास्त्र बहुत कुछ शिव और पार्वती के संवाद रूप में
है जिसमें शिव पार्वती को आगम के सिद्धान्तों को बतलाते हैं। पार्वती को
यहाँ ‘प्रिये’ कहकर सम्बोधित किया है।