प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
स चैको द्विरूपस्त्रिमयश्चतुरात्मा
सप्तपञ्चकस्वभावः ॥ ७ ॥
निर्णीतदृशा चिदात्मा शिवभट्टारक एव 'एक' आत्मा, न तु
अन्यः कश्चित्; प्रकाशस्य देशकालादिभिः भेदायोगात्; जडस्य तु
ग्राहकत्वानुपपत्तेः । प्रकाश एव यतः स्वातन्त्र्यात् गृहीतप्राणादि-
संकोचः संकुचितार्थग्राहकतामश्नुते, ततः असौ प्रकाशरूपत्व-
संकोचावभासवत्त्वाभ्यां 'द्विरूपः' । आणव-मायीय-कार्ममलावृतत्वात्
'त्रिमयः' । शून्य-प्राण-पुर्यष्टकशरीरस्वभावत्वात् 'चतुरात्मा' ।
सूत्र ७-और यद्यपि वह (आत्मा) एक है तथापि द्विरूप, त्रिमय चतुर्मय
और सात पंचक स्वभाव वाला है ॥७॥
भाष्य-जैसा पहले निर्णय किया जा चुका है उस दृष्टि से चित् रूपी
भगवान् शिव एक आत्मा है, दूसरा कोई नहीं । क्योंकि प्रकाश (प्रकाश रूप
आत्मा ) का देश, काल आदि द्वारा भेद नहीं किया जा सकता; जड़ का तो
ग्राहकत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता ।*
यतः प्रकाश ही अपने स्वातंत्र्य५९ से प्राण इत्यादि संकोच को धारण
कर लेता है और संकुचित अर्थों ( विषयों ) का ग्राहक ( ज्ञाता ) बनता है
अतः वह (१) प्रकाश रूप और (२) संकुचित अवभास रूप के कारण द्विरूप
( दो रूप वाला ) बन जाता है ।
आणव, मायीय और कार्म मल६० से आवृत अर्थात् आच्छादित होने के
कारण वह त्रिमय ( तीन प्रकार वाला ) भी कहलाता है ।
वह (१) शून्य६१ (२) प्राण (३) पुर्यष्टक६२ (४) और ( स्थूल )
शरीर का स्वभाव ग्रहण करता है । इस लिए वह चतुरात्मा कहलाता है ।
- कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मा चित् स्वरूप है । चित् सर्वदा
प्रकाश स्वरूप है । भेद देश, काल आदि के द्वारा होता है। प्रकाश का देश,
काल आदि के द्वारा भेद नहीं किया जा सकता । प्रकाश सर्वदा सर्वथा प्रकाश
ही रहता है । अतः प्रकाश एक है। आत्मा प्रकाश स्वरूप है, अतः आत्मा
एक है । और जड़ तो ग्राहक बन ही नहीं सकता; वह तो केवल ग्राह्य ही
रहता है ।