प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यभिज्ञाहृदय ५५
वृता। तत्रापि क्रमेण संकोचस्य तनुतायाम्, ईश-सदाशिवानाश्रित-
रूपता। समाधिप्रयत्नोपाजिते तु चित्प्रधानत्वे शुद्धाध्वप्रमातृता
क्रमात्क्रमं प्रकर्षवती। संकोचप्राधान्ये तु शून्यादिप्रमातृता। एवमव-
स्थिते सति, 'चितिरेव' संकुचितग्राहकरूपा 'चेतनपदात् अवरूढा'--
अर्थग्रहणोन्मुखी सती 'वेत्येन'-नील-सुखादिना 'संकोचिनी' उभय-
संकोचसंकुचितैव चित्तम्। तथा च
'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या।
मायात्तृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस्तमः ॥'
परामर्श (विमर्श) सहित प्रकाश के प्रधान होने पर विद्या-प्रमाता ५१ की
अवस्था होती है। इस स्थिति में भी (अर्थात् विमर्शसहित प्रकाश की अव-
स्थामें) क्रम से संकोच के कम होने पर ईश, सदाशिव और अनाश्रित
शिव ५२ की दशा प्राप्त होती है।
समाधि के प्रयत्न से प्राप्त किये हुए चित् के प्रधानत्व में, शुद्धाध्व ५३ का
प्रमाता क्रमशः सर्वोच्च स्थिति में पहुँचता है। ❊
(चित् के) संकोच की प्रधानता होने पर शून्यादिप्रमाता होते हैं। इस
प्रकार से स्थित होने पर चिति ही (चैतन्य स्वरूप ही) संकुचित (परिमित)
प्रमाता के रूप में चेतन पद (असंकुचित प्रमाता के पद) से उतर कर विषयों
को ग्रहण करने के लिए प्रवृत्त होकर चेत्य अर्थात् ग्राह्य या प्रमेयों- जैसे
नील (बाह्यप्रमेय) सुख (आन्तर प्रमेय) इत्यादि से संकुचित होकर, दो
संकोचों (बाह्य और आन्तर प्रमेय) से संकुचित होकर चित्त बन जाती है।
(चिति ही, समष्टि चेतना ही संकोच के कारण, परिच्छिन्न होकर चित्त
अर्थात् व्यष्टिचेतना बन जाती है)।
❊ इसका भाव यह है कि चित् की प्रधानता या तो सहज रूप में होती
हैं या समाधि के प्रयत्न से अर्जित होती है। सहज रूप में जो चित् की प्रधा-
नता होती है उसमें या तो प्रकाशमात्र की प्रधानता हो सकती है या विमर्श
सहित प्रकाश की प्रधानता हो सकती है। प्रकाशमात्र की प्रधानता का प्रमाता
विज्ञानाकल है, विमर्श सहित प्रकाश की प्रधानता के प्रमाता विद्या-प्रमाता
(शुद्धविद्याप्रमाता) हैं। समाधि के प्रयत्न द्वारा अर्जित चित् की प्रधानता के
प्रमाता शुद्धाध्वप्रमाता होते हैं जो क्रमशः सर्वोच्च अवस्थातक पहुँच जाते हैं।