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सर्वकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 187 में से

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पृष्ठ 51

( ४१ )
प्राप्त करने का अभ्यास केवल देह, प्राण इत्यादि से जो मिथ्या तादात्म्य है
उसको हटाने के लिए है ।
सूत्र १६-चिदानन्द लाभ होने पर देह इत्यादि का अनुभव होने पर
भी चित् से एकात्मता का बोध दृढ़ हो जाता है ।
चित् से एकात्मता जीवनन्मुक्ति की अवस्था है । यह अवस्था अज्ञान के
हट जाने और अपने वास्तविक स्वरूप के ज्ञान के उदय होने पर होती है ।
सूत्र १७-मध्य के विकास से चिदानन्द लाभ होता है ।
मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है। संवित् या चित्-शक्ति
ही मध्य है। संवित् इसलिए मध्य कहलाता है, क्योंकि यह सब कुछ का
अन्तरतम तथ्य और आश्रय है । व्यक्ति में वह सुषुम्ना नाड़ी है । व्यक्ति में
जब मध्य का विकास होता है अर्थात् उसमें जब सुषुम्ना का विकास होता
है तब उसे समष्टि चेतना के चिदानन्द का लाभ होता है ।
सूत्र १८-मध्य के विकास के लिए निम्नलिखित उपाय हैं:—
विकल्पक्षय ; शक्ति का संकोच और विकास; वाहों का ध्वंस; आदि
और अन्त कोटियों का अभ्यास ।
विकल्पक्षय सर्वश्रेष्ठ उपाय है। इसमें साधक को चाहिए कि वह अपने
चित्त को हृदय में एकाग्र करे, किसी विकल्प को न उठने दे । इस प्रकार
चित्त को अविकल्प दशा में लाकर देह, प्राण इत्यादि से भिन्न आत्मा को
वास्तविक प्रमाता के रूप में वह चेतना में केन्द्रीभूत करे, तो मध्य का
विकास होगा और साधक तुर्य और तुर्यातीत दशा में पहुँच जायगा । मध्य-
विकास के लिए प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का यह मुख्य उपाय है ।
अन्य उपाय प्रत्यभिज्ञा शास्त्र के नहीं हैं, किन्तु उपयोगी होने के कारण
बतलाये गये हैं ।
शक्ति का संकोच और विकास :—शक्ति का संकोच—इसका अर्थ
इन्द्रियों के द्वारा जो चेतना बहिर्मुखी होती है उसे अन्तर्मुखी करके आत्मा
पर केन्द्रित करना है। शक्ति का विकास—इसका अर्थ यह है कि इन्द्रियां
पदार्थों की ओर प्रवृत्त हों, परन्तु चित्त भीतर की ओर केन्द्रित हो । शंवित
के संकोच और विकास का दूसरा उपाय है ऊर्ध्वकुण्डलिनी में प्रसर और
विश्रान्ति का अभ्यास । उत्थानदशा में भी समाधि के अनुभव को स्थिर
रखना प्रसर या विकास है और पुनः समाधि में चला जाना और उस दशा
में स्थिर रहता विश्रान्ति या संकोच है ।