प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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विकल्प विभिन्नता, भेदयुक्त ज्ञान, प्रत्ययन, कल्पना ।
विकल्पनम् चित् की भेद-ज्ञान की क्रिया ।
विकल्पक्षय विकल्पों का विलोप ।
विकास खिलना, प्रसार ।
विग्रह शरीर, रूप, आकार ।
विग्रही शरीरी, शरीरयुक्त ।
विद्या परिच्छिन्न ज्ञान ।
विभूति वैभव, महत्ता, अलौकिक शक्ति ।
विमर्श शब्दार्थ-अनुभव, ज्ञान इस शास्त्र में पारि-
भाषिक अर्थ-परम शिव की ज्ञान क्रियात्मक
आत्मसं वित्ति-रूपी-शक्ति जिससे सृष्टि होती है
विमर्शन आन्तर्बोध, गूढ़ार्थ-संहार ।
विलय संगोपन, तिरोभाव ।
विलापन संहार, (गूढ़ार्थ) अनुग्रह ।
विश्व समग्र ब्रह्माण्ड, समग्र ।
विश्वमय विश्वात्मक समग्र ब्रह्माण्ड में अन्तर्व्याप्त, सर्वव्यापी, अन्त-
र्वर्ती, विश्वानुग ।
विश्वोत्तीर्ण परात्पर, भौतिक संसृति से परे, अतिवर्ती
विश्वातिग ।
विष यह शैव योग का एक पारिभाषिक शब्द है ।
अधःकुण्डलिनी के मध्य के शेष अर्धभाग और
उसके पूर्ण अग्रभाग से लेकर ऊर्ध्वकुण्डलिनी
तक में आवेश अथवा प्रवेश 'विष' कहलाता है।
विज्ञानाकल वह व्यक्ति जो माया से तो ऊपर है, किन्तु
शुद्धविद्या से नीचे है, जिसमें ज्ञान है किन्तु
कर्तृत्व नहीं है । वह कार्म और मायीय मल
से मुक्त होता है किन्तु अभी आणव मल से
मुक्त नहीं है ।
वैखरी शक्ति जो स्थूल, भौतिक अक्षर में व्यक्त है ।
वैष्णव विष्णु का अनुयायीः वैष्णवदर्शन और प्रक्रिया
का अनुयायी ।
व्यान वह वायु या प्राण जो चारों ओर व्याप्त है ।
व्यापकत्व सर्वव्यापिता ।
व्यामोहितता मोह ।