प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
DevanagariHindipublished278 पृष्ठ
पृष्ठ 40, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 40'जिन जिन देवो ने प्रासाद के आकार वाली पूजा की, उनके नाम वाले, जो जो प्रासाद
प्रथमोऽध्यायः ३
'जिन जिन देवो ने प्रासाद के आकार वाली पूजा की, उनके नाम वाले, जो जो प्रासाद
उत्पन्न हुए, उनको अनुक्रम से कहूँगा (१) देवो के पूजन से नागर जाति, (२) दानवो के पूजन से
द्राविडजाति, (३) गन्धर्वो के पूजन से लतिनजाति, (४) यक्षों के पूजन से विमानजाति,
(५) विद्याधरों के पूजन से मिश्रजाति, (६) वसु देवो के पूजन से वराटकजाति, (७) नागदेवो के
पूजन से सान्धार जाति, (८,) नरेन्द्रो के पूजन से भूमिजजाति, (६) सूर्यदेवो के पूजन से विमान-
नागर जाति, (१०) चन्द्रमा के पूजन से विमानपुष्पक जाति, (११) पार्वती के पूजन से वलभी
जाति, (१२) हरसिद्धि आदि देवियों के पूजन से सिंहावलोकन जाति, (१३) व्यन्तर स्थित देवों
के पूजन से फांसी के आकार वाली जाति, १४-और इन्द्रलोक के देवो के पूजन से रथारूढ़
(दारुजादि) जाति, ये चौदह जाति के प्रासाद उत्पन्न हुए।
आठ जाति के उत्तम प्रासाद—
नागरा द्राविडाश्चैव भूमिजा लतिनास्तथा ।
सावन्धारा विमानादि-नागराः पुष्पकाङ्किताः' ॥७॥
मिश्रकास्तिलकैः २ शृङ्गैरुत्तै जातिषु चोत्तमाः ।
सर्वदेवेषु कर्त्तव्याः शिवस्यापि विशेषतः ॥८॥
चौदह जाति के प्रासादों मे (१) नागर, (२) द्राविड, (३) भूमिज, (४) लतिन, (५) सावं-
धार (सांधार केसरी आदि), (६) विमान नागर, (७) विमान पुष्पक, और (८) शृङ्ग और
तिलक वाला मिश्र, ये आठ जाति के प्रासाद उत्तम हैं। इसलिये सब देवो के लिये यही
बनाने चाहिये, उनमे भी विशेषकर महादेवजी के लिये बनाना श्रेयस्कर है ॥७-८॥
प्रासादानां च सर्वेषां जातयो देशभेदतः ।
चतुर्दश प्रवर्त्तन्ते ज्ञेया लोकानुसारतः ॥६॥
सब प्रासादो के भेद देशो के भेद के अनुसार होते है। इनके मुख्य चौदह भेद है,
वे अन्य अपराजित पृच्छा सूत्र ११२ आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥६॥
लक्ष्यलक्षणतोऽभ्यासाद् गुरुमार्गानुसारतः ।
प्रासादभवनादीनां सर्वज्ञानमवाप्यते ॥१०॥
प्रासाद और गृह आदि बनाने के लिये सब प्रकार का शिल्पज्ञान, उसके लक्ष्य और
लक्षण के अभ्यास से एवं गुरुशिक्षा के अनुसार प्राप्त करना चाहिये ॥१०॥
(१) पुष्पकान्विता (२) प्रासादमिश्रकारश्चैव