सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 238

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १०६
विभक्ति पांचवीं ।
६-सुमतिजिनवल्लभ प्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्दशविभाजिते ॥२५॥
कर्णो द्विभागिको ज्ञेयः प्रतिकर्णस्तथैव च ।
निर्गमस्तत्समो ज्ञेयो नन्दिका भागविश्रुता ॥२६॥
भद्रार्थं च द्विभागेन कर्त्तव्यं च चतुर्दिशि ।
कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥२७॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि तथाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ।
नन्दिकायां शृङ्गकूटं सुमतिजिननामतः ॥२८॥
इति सुमतिजिनवल्लभप्रासादः ॥६॥
समचोरस भूमिका चौदह भाग करे, उनमे से दो भाग का कोना, दो भाग का प्रतिरथ,
एक भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रार्ध बनावे । कोना और प्रतिरथ का निर्गम समदल
रक्खे । कोने के ऊपर दो क्रम, प्रतिरथ के ऊपर दो क्रम, प्रत्येक भद्र के ऊपर चार उरुशृंग,
आठ प्रत्यंगशृंग और नन्दी के ऊपर एक श्रीवत्सशृंग तथा एक कूट चढावे । यह
सुमतिजिन नाम का प्रासाद है ॥२५ से २८॥
शृंग सख्या-कोने ५६, प्रतिरथे ११२, भद्रे १६, प्रत्यग, ८, नंदी के ऊपर ८, एक
शिखर कुल २०१ शृंग । चार कूट नंदी पर ।
विभक्ति छठी ।
७-पद्मप्रभजिन प्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशधा प्रतिभाजिते ।
कर्णो भागद्वयं कार्यः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥२९॥
कर्णिका नन्दिका भागा भद्रार्थं चतुर्भागकम् ।
कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥३०॥
केसरीं सर्वतोभद्रं क्रमद्वयं व्यवस्थितम् ।
कर्णिकायां शृङ्गकूटं नन्दिकायां तथैव च ॥३१॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि ह्यष्टौ प्रत्यङ्गानि च ।
पद्मवल्लभनामोऽयं जिनेन्द्रे पद्मनायके ॥३२॥
इति पद्मप्रभजिनप्रासादः ॥७॥