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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः ६३
भाग अर्द्धचन्द्र के आकार वाला बनावे। इसके कोने मे घंटडीया लगावे और ऊपर
कलश रखे ॥४५॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १४४ में कहा है कि—
"मण्डूकी तस्य कर्त्तव्या अर्धचन्द्राकृतिस्तथा।
पृथुदण्डसप्तगुणा हस्तादिपञ्चकावधि ॥
षड्गुणा च द्वादशान्तं शेषाः पञ्चगुणास्तथा ।
तथा त्रिभागविस्ताराः कर्त्तव्याः सर्वकामदाः ॥
अर्धचन्द्राकृतिश्चैव पक्षे कुर्याद् गगारकम् ।
वंशोर्ध्व कलशं चैव पक्षे घण्टाप्रलम्बनम् ॥"
ध्वजादंड की पाटली अर्धचंद्र के आकार की बनावे । वह एक से पाच हाथ तक के लबे
व जादंड के विस्तार से सातगुणी, छह से बारह हाथ तक के लम्बे ध्वजादंड के विस्तार से
षगुणी और तेरह से पचास हाथ तक के ध्वजादंड के विस्तार से पाचगुणी पाटली लम्बाई मे
रखे। लम्बाई का तीसरा भाग विस्तार मे रखे । यह सब इच्छितफल को देनेवाली है ।
अर्धचंद्राकृति के दोनो तरफ गगारक बनावे । दंड के ऊपर कलश रखे और पाटली के दोनो
वगल में लम्बी घंटडीया लगाना चाहिये ।
ध्वजा का मान---
ध्वजा दण्डप्रमाणेन दैर्घ्येऽष्टांशेन विस्तरे ।
नानावस्त्रैर्विचित्रार्था-स्त्रिपञ्चाग्रशिखोत्तमा ॥४६॥
ध्वजादंड के लबाई के मान की ध्वजा की लंबाई रक्खे और लम्बाई से आठवे भाग की
चौड़ाई रखे । यह अनेक वर्ण के वस्त्रो की बनावे और अग्रभाग मे तीन अथवा पाच शिखाये
बनावे ॥४६॥
ध्वजा का महात्म्य—
पुरे च नगरे कोट्टे रथे राजगृहे तथा ।
वापीकूपतडागेषु ध्वजाः कार्याः सुशोभनाः ॥४७॥
पुर, नगर, किला, रथ, राजमहल, वावडी, कूंआं और तालाव आदि स्थानो के ऊपर
सुन्दर ध्वजा रखनी चाहिये ॥४७॥
निष्पन्नं शिखरं दृष्ट्वा ध्वजहीने सुरालये ।
असुरा वासमिच्छन्ति ध्वजहीनं न कारयेत् ॥४८॥