प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
प्रबोधसुधाकर
सुतरामनन्यशरणाः क्षीराद्याहारमन्तरा यद्वत् ।
केवलया स्नेहदृशा कच्छपतनयाः प्रजीवन्ति ॥२५५॥
जिनका कोई अन्य आश्रय नहीं है ऐसे कछुईके बच्चे जिस
प्रकार दूध आदि आहारके बिना ही केवल माताकी स्नेह-दृष्टिसे
ही पलते हैं, उसी प्रकार अनन्य भक्त भी भगवान्की दया-दृष्टिके
सहारे ही जीवन-निर्वाह करते हैं ।
यद्यपि गगनं शून्यं तथापि जलदामृतांशुरूपेण ।
चातकचकोरनाम्नोर्दृढभावात्पूरयत्याशाम् ॥२५६॥
यद्यपि आकाश शून्यरूप है तथापि चातक और चकोर
नामक पक्षियोंकी दृढ़ भावनासे मेघ और चन्द्रमाके रूपमें वह
उनकी आशाओंको पूर्ण कर देता है !
यद्द्व्रजतां पुंसां दृग्वाङ्मनसामगोचरोऽपि हरिः ।
कृपया फलत्यकस्मात्सत्यानन्दामृतेन विपुलेन ॥
इसी प्रकार वाणी और मनके अगोचर होकर भी श्रीहरि
अपने शरणागत पुरुषोंकी कामनाओंको अकारण ही कृपापूर्वक
सत्यानन्दरूपी प्रचुर अमृतसे पूर्ण कर देते हैं ।
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपाद-
शिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
प्रबोधसुधाकरः समाप्तः
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याद रखिये !
अन्तःकरण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीके चरणकमलोंकी
भक्तिके बिना कभी शुद्ध नहीं हो सकता। जैसे वस्त्रको क्षारयुक्त
जलसे शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार चित्तको भक्तिसे
निर्मल किया जा सकता है।