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सर्वकोश
प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 86 में से

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पृष्ठ 17

विषय-निन्दा
भार्या रूपविहीना मनसः क्षोभाय जायते पुंसाम् ।
अत्यन्तं रूपाढ्या सा परपुरुषैर्वशीक्रियते ॥३०॥
जो स्त्री कुरूपा होती है उससे तो पुरुषोंका चित्त कुढ़ा
करता है और जो अत्यन्त रूपवती होती है वह परपुरुषोंके
चंगुलमें फँस जाती है ।
यः कश्चित्परपुरुषो मित्रं भृत्योऽथवा भिक्षुः ।
पश्यति हि साभिलाषं विलक्षणोदाररूपवतीम् ॥३१॥
मित्र, सेवक अथवा भिक्षुक कोई भी परपुरुष क्यों न हो
अति अद्भुत रूपवती स्त्रीको वह चाहभरी दृष्टिसे देखने ही लगता है ।
यं कञ्चित्पुरुषवरं स्वभर्तुरतिसुन्दरं दृष्ट्वा ।
मृगयति किं न मृगाक्षी मनसेव परस्त्रियं पुरुषः ॥३२॥
जिस प्रकार पुरुष रूपवती स्त्रीकी ताकमें रहता है उसी
प्रकार क्या मृगलोचना स्त्री अपने पतिसे अधिक रूपवान् पुरुषको
देखकर उसे मन-ही-मन नहीं ढूँ ढ़ा करती ?
एवं सुरूपनार्या भर्ता कोपात्प्रतिक्षणं क्षीणः ।
नो लभते सुखलेशं बलिमिव बलिभुग्बहुष्वेकः ॥३३॥
इस प्रकार रूपवती स्त्रीका पति क्षण-क्षणमें ईर्ष्यानलसे क्षीण
होता हुआ जरा भी चैन नहीं पाता; जैसे बहुत-से कौवोंमें पड़ी हुई
बलिको एक कौवा नहीं पा सकता ।
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