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प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

श्लोकानुक्रमणिका २५३
मामनालोक्य ३ २ शब्दान्नैव शृणोति ६ ५
मुक्तासङ्ककुरङ्ग २ १ शान्तेऽनन्तमहिम्नि ४ ६
मुक्ताहारलता ४ ९ शान्तं ज्योतिः ६ २३
मूलं देवी ३ २६ श्येनावपात ४ ३
मृतानामपि २ २१ श्रियो ज्वाला ५ २४
मृत्युर्नृत्यति ४ २३ श्रीदेवी जनका ३ ४
मृद्भिन्दुलाञ्छित २ ६ श्रोणीभारभरालसा २ ३४
मोहान्धकार ६ ३० सङ्गं न केनचि ६ ३१
यदप्यभ्युदयः ५ ४ सज्जन्तां कुम्भ ४ २५
यन्नास्येव २ १७ सततधृति १ २५
यः प्रागासीदभि २ ३६ सदनमुपगतो २ १०
यस्माद्विश्वमुदेति ६ १४ स नरकादिव ६ ४
यस्य हस्तौ च ३ १४ सन्तु विलोकन १ १६
येन त्रिःसप्त १ ७ सन्ध्येते मम २ ३०
षण्डाः पीनपयो १ १८ संभूतः प्रथम १ १७
रम्यं हर्म्यतलं १ १२ समानान्वय ५ ८
रागादिभिः सरल १ २२ समारम्भा भग्नाः ४ २०
लभ्यं लब्धं १ २१ संमोहयन्ति १ २७
कलिततानां ५ १९ सर्वं क्षणक्षयिण ३ ८
वश प्राप्ते मृत्योः ५ २२ सहजमलिन १ २१
विद्याधरी वाथ ३ २३ साङ्ख्यन्याय ५ ७
विद्याप्रबोधोदय २ १२ सैषान्तर्वर्धती ४ २९
विष्पट्टणीलुप्यल ३ १७ सोऽपि स्ववीर्या १ ८
विपाकदारुणो २ २७ सोऽहं प्रकीर्णैः ४ १४
विपुलपुलिनाः ४ १२ स्फटिकमणि १ २६
विभेचकर्म ६ १८ स्फुरद्रोमोद्भेद १ २०
विवेकेनैव १ ९ स्मर्यते सा हि २ ३७
विष्णोरायतना ५ ५ स्वप्नेऽपि देवी ५ १३
विसर्पति ५ १२ स्वभावलीनानि ६ १७
वेदोपवेदाङ्ग ५ ६ स्वर्गः कर्तृक्रिया २ १९
वेश्यावेश्मसु २ १ स्वाराज्यं प्राप्य ३ १०
व्यतीतवेदार्थ २ २५ हरिहरसुरज्येष्ठ ३ १०

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डॉ० भोलाशङ्कर व्यास
की
अमर कृति
संस्कृत-कवि-दर्शन
इसमें संस्कृत के चुने हुए चोटी के २० कवियों पर गवेषणापूर्ण
आलोचनात्मक निबन्धों का संग्रह है । पाश्चात्य नव्य समीक्षा-पद्धति और पौरस्त्य
रसालङ्कारवाली आलोचनसरणि का समन्वय कर विद्वान् लेखक ने समीक्षा के
क्षेत्र में निःसन्देह एक नवीन उद्भावना की है । समाज-शास्त्र की वैज्ञानिक
आधारभित्ति को लेकर पल्लवित किया गया यह आलोचनप्रासाद अपनी
प्रामाणिकता और शास्त्रीयता में बेजोड़ है । इस ग्रन्थ में न तो पाश्चात्य पण्डितों
की तरह कोई पूर्वाग्रह ही है, न भारतीय पण्डितों की आलोचना की तरह एकाङ्गिता
ही । नवीनता और प्राचीनता के समन्वय ने डॉ० व्यास की समीक्षा में मणि-
काञ्चन-संयोग घटित कर दिया है। कवियों पर निजी मौलिक उद्भावनाएँ उपन्यस्त
कर विद्वान् लेखक ने व्यावहारिक समीक्षा को दार्शनिक रूप दिया है, और ग्रन्थ
का नामकरण भी इसका सङ्केत करता है । कई कवियों के विषय में ऐसे मौलिक
सङ्केत किये गये हैं, जो अनुसन्धान-कर्त्ताओं को मार्ग दिशा दे सकते हैं। साहित्यिक
समाज को बड़े दिनों से संस्कृत कवियों पर हिन्दी में सैद्धान्तिक, व्यावहारिक
और समाजशास्त्रीय आलोचना का अभाव खटकता था। डॉ० व्यास ने इस अभाव
की पूर्ति कर दी है । इस दिशा में डॉ० व्यास का यह प्रयास राष्ट्रभाषा में सर्व-
प्रथम होते हुए भी, प्रामाणिक और महनीय है । साहित्य के शास्त्री, आचार्य
तथा बी० ए०, एम० ए० और साहित्यरत्न की परीक्षाओं में निबन्ध और इतिहास
के लिये यह पुस्तक अधिक उपादेय है । मूल्य ६)
प्राप्तिस्थान—
चौखम्बा विद्या भवन
चौक, बनारस-१