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सर्वकोश
प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

प्रबोधचन्द्रोदयम् (कृष्णमिश्र यति - वेदान्त रूपक नाटक सटीक)

Prabodhachandrodaya of Krishnamishra with Commentary

कृष्णमिश्र यति द्वारा

DevanagariHindipublished274 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 274 में से

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पृष्ठ 12

कथासार
प्रथम अङ्क
मनकी दोस्त्रियाँ प्रवृत्ति और निवृत्तिसे उत्पन्न मोह और विवेक एक दूसरेके विरोधी
हों जाते हैं । विवेकके पक्षमे शान्ति, श्रद्धा आदि और मोहके पक्षमे काम, लोभ, तृष्णा,
क्रोध, हिंसा आदि है । काम और रति का प्रवेश होता है, रति कामसे कहती है मोहके
प्रतिपक्ष विवेक ऐक आफत है । काम उसे विश्वास दिलाता है कि तुम स्त्री होनेसे ही इस
तरह डर रही हो नहीं तो विवेककी कुछ हस्ती नहीं है, तुम जो विवेकके मन्त्री यम,
नियम आदिकी बातें करती हो उनके विपक्षमें तो अकेला हमारा चित्तविकार ही पर्याप्त है ।
खास करके मद, मात्सर्य आदिके सामने तो वह यम, नियम आदि ठहर ही नहीं सकने ।
स्त्रीजाति सामान्यतः अपने को सुरक्षित रखना चाहती है, स्वभावतः रति कामसे पूछती
है कि सुनती हूं-आप लोगों का और विवेक आदिका एक ही वंश है । कामने उत्तर दिया
कि वंश एक है यह क्या पूछती हो ? पिता ही हम दोनोंके एक है । विषयका लोभ ही
सदासे सोदरोंमें विरोध कराता आया है । इस संसारको हमारे पिता मनने अर्जित किया,
हम पिताके प्रिय थे, हमने उस पर सर्वाधिकार कर लिया, इसीलिये यह विवेक हमलोगोको
और पिताजी को उन्मूलित करना चाहता है । रतिने प्रश्न किया कि क्या इतना बडा पाप
विद्वेषमात्रसे किया जारहा है ? इस पर कामने बताया कि तुम स्त्री हो, डर जाओगी, हमारे
वंशमे विद्या नामकी राक्षसी जन्म ग्रहण करनेवाली है । इस पर रति डरकर कामसे
लिपट जाती है, काम उसे भरोसा देता है कि हमारे जीते विद्या की उत्पत्ति कैसे होगी, तुम
धीरज धरो। इस पर रतिने पूछा कि क्या विवेक आदि विद्या की उत्पत्ति चाहते हैं ? यह तो
उनका भी संहार कर देगी । इसका उत्तर कामने हाँ में दिया । इधर मति और विवेक बातें
कर रहे है-विवेक मतिसे कहता है कि-प्रिये, सुना तुमने यह अभागा काम हमे
ही पापी बता रहा है । यह अभागे नित्यशुद्धबुद्ध पुरुषको बन्धनमें डाला है फिर भी यह
सुकृती है और उनकी मुक्तिके लिये प्रयत्नपरायण हम पापी है । मति पूछती है कि पुरुष
तो स्वाभाविक आनन्दमय है उसे इन लोगोने कैसे बन्धनमें डाला ? इसका उत्तर विवेकने
दिया कि-होशियार आदमी भी स्त्रियों द्वारा प्रतारित होकर बन्धनमें पड़ता है, ये भी तो
मायाके द्वारा ही बन्धनमें डाले गये है। मतिने इसके उद्धार का कारण पूछा, विवेकने उत्तर
दिया कि उपनिषत्के साथ हमारा सम्बन्ध होनेसे प्रबोध की उत्पत्ति होगी तभी यह बन्धन
छूट सकता है, मतिने इसमें कोई आपत्ति नही की ।
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