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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

८४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश
और वे अन्तर्धान हो गये । फिर वह भी उस वृक्षकी छायाको रेखांकित करके, उसके भीतर पड़ने वाली
[ सभी ] ओषधियोंके अंकुरोंको उखाड़ उखाड़ कर वृषभके मुँहमें डालने लगी । उस अज्ञात स्वरूप
ओषधिके मुँहमें पड़ते ही वह बैल फिर मनुष्य हो गया । अज्ञात स्वरूप हो कर भी, ओषधिने जैसे अभीष्ट
कार्य किया, वैसे ही कलियुगमें मोहके कारण, बहु पात्र-परिज्ञान तिरोहित होने पर भी, भक्तियुक्त हो कर
सब दर्शनोंका आराधन करनेसे, अविदित स्वरूप-ही-से मुक्तिदायक हो जाता है, यह निश्चय है । इस प्रकार
श्रीहेमचंद्राचार्यने जब सर्व दर्शनके सम्मत होनेका उपदेश दिया तो श्री सिद्धराजने फिर सब धर्मोंका
समान आराधन किया ।
इस प्रकार यह सर्व दर्शन मान्यता प्रबंध समाप्त हुआ ।
*
सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार ।
११२) एक दूसरी बार रातमें, राजा कर्ण मेरु प्रसादमें नाटक देख रहा था । वहाँ पर कोई चना
बेचने वाला एक गरीब बनिया भी चला आया और वह राजाके कन्धे पर हाथ रख कर देखने लगा । राजा
उसके इस अभिनव ( व्यवहार ) से मनमें प्रसन्न हो रहा, और बार बार उसका दिया हुआ कर्पूर मिश्रित
पानका बीड़ा आनंदके साथ लेता रहा । नाटकके विसर्जन होने पर, राजाने अनुचरोंके द्वारा उसका घर आदि
अच्छी तरह जान लिया और फिर अपने महलमें आ कर सो गया । सबेरे उठ कर प्रातःकृत्य कर लेने बाद,
सर्वावसर ( राजसभा ) के मिलने पर, राजाने सभामंडपको अलंकृत किया और उस चना बेचने वाले बनियेको
बुलाया । राजाने उससे [ व्यंगमें ] कहा कि- 'रातमें तुमने जो मेरे कन्धे पर हाथ रखा था उससे मेरी गर्दनमें
दर्द हो रहा है' -तो उस तत्कालोत्पन्न मति वाले (हाजिर जवाब ) बनियेने कहा कि- 'महाराज ! आसमुद्र
विस्तृत ऐसी पृथ्वीके भारको कन्धे पर उठा रखनेसे यदि स्वामीके कन्धेमें कोई पीड़ा नहीं होती तो मुझ समान
तृण-मात्रसे निर्जीव बनियेके भारसे स्वामीके कन्धोंमें क्या पीड़ा होगी !' उसके इस उचित उत्तरको सुन कर
राजा बड़ा प्रसन्न हुआ और बदलेमें उसको इनाम दे कर विदा किया ।
इस तरह यह चना बेचनेवाले बनियेका प्रबंध समाप्त हुआ ।
*
लक्षाधिपतिको क्रोडपति बना देना ।
११३) एक दूसरी रातको, राजा कर्ण मेरु प्रासादसे नाटक देख कर लौट रहा था, तब [ राजमार्गमें ]
किसी व्यवहारीके घर पर बहुत-से दीपक जलते हुए देख कर पूछा कि- 'यह क्या है ?' उसने कहा कि ये
लक्षप्रदीप हैं । राजाने उसको धन्य कहा और वह अपने महलमें चला गया । रात्रिको व्यतीत कर [ अपने
नगरमें ऐसे प्रजाजन है इस विचारसे ] अपनेको धन्य मानता हुआ, सबेरे उसे राजसभामें बुला कर आदेश किया
कि- ' इन प्रदीपोंको सदा जलाते रहनेसे तुमको सदा ही अग्निका भय रहता है, तो कहो कि तुम्हारे पास कितने
लाखका धन है'। उत्तरमें उसने निवेदन किया कि- 'वर्तमानमें चौरासी लाख है' । इस पर मनमें अनुकंपित
हो कर राजाने कृपापूर्वक अपने खजानेसे १६ लाख निकाल कर दे दिया और उसके मकान पर [ दीपकोंके
बदले ] कोटिपति होनेका सूचक कोटिध्वज फहराया गया ।
इस तरह यह पोटिललसप्रसाद प्रबंध समाप्त हुआ ।
*