प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश
आज्ञासे अन्य व्याकरणोंको छोड़कर लोग सब उसीका अध्ययन करने लगे। इस पर किसी मत्सरीने राजासे कहा
कि 'इस व्याकरणमें आपके वंशका तो कोई उल्लेख ही नहीं है !' इससे राजाके मनमें क्रोध हुआ। यह
बात किसी राजपुरुषसे जान कर श्री हेमाचार्यने [ तत्काल ] बत्तीस श्लोक नूतन निर्माण करके बत्तीस ही
सूत्रपादोंके अन्तमें उन्हें संलग्न कर दिया। प्रातःकाल जब राजसभामें व्याकरण बांचा गया तो-
१३८. हरिकी भाँति बलि बंधकर (= १ बलिको बाँधनेवाला, २ बलियोंको बंदी करनेवाला ), शिवकी
नाँई त्रिशक्तियुक्त, और ब्रह्माकी तरह कमलाश्रय (= १ कमलका आश्रय लेनेवाला, और २ कमला-
लक्ष्मीका आश्रय ) श्री मूलराज नृपकी जय हो।
इत्यादि, चौलुक्य वंशकी स्तुतिवाले बत्तीस श्लोक बत्तीस सूत्रपादोंके अन्तमे आये सुन कर राजा मनमें
प्रमुदित हुआ और उस व्याकरणका उसने खूब प्रचार कराया। इसी प्रकार श्रीसिद्धराज के दिग्विजय
वर्णनमें [ हेमाचार्यने ] द्याश्रय नामक [ काव्य ] ग्रंथ बनाया।
[ हेमाचार्यके बनाए इस सिद्ध हैम व्याकरण के विषयमें विद्वानोंने ऐसी उक्तियाँ कही हैं- ]
१३९. हे भाई ! पाणिनिके प्रलापको बंद करो, कातंत्र का चीथड़ा मत फाड़ो शाकटायन के
कटु वचनको मत पढ़ो, और क्षुद्र चांद्रव्याकरण से क्या मतलब है, भलों, और कण्ठाभरण आदि व्याकरणोंसे
अपने आपको कोई क्यों भुलायेगा, जब कि अर्थमधुर ऐसी श्री सिद्धहैम की उक्तियाँ सुननेको मिलती हैं।
९८) इसके बाद, श्री सिद्धराज ने पत्तन में यशोवर्मराजा को, त्रिपुरुषप्रभृति सभी राजप्रासादों
और सहस्रलिंग प्रभृति धर्मस्थानोंको दिखा कर बताया कि-[ हमारे राज्यमें ] प्रतिवर्ष देवदायमें एक करोड़
द्रव्य व्यय किया जाता है।। और फिर उससे पूछा कि 'यह सुंदर है या असुंदर ?'। वह बोला-मैं तो अठारह
लाख संख्यावाले (!) मालवदेश का राजा हूँ, तो भी मैं तुमसे पराजित कैसे हुआ ?। पर यह देश तो
पहले ही महाकालदेव को अर्पण कर दिया गया है और उसी देवद्रव्यका हम मालवी लोग उपभोग
कर रहे हैं; और इसीलिये हमारा उदय और अस्त होता रहता है। आपके वंशवाले राजा भी इतना
देवद्रव्य व्यय करनेमें असमर्थ हो कर उसका लोप करेंगे और फिर सारा देवदाय बंद हो जानेपर इसी प्रकार वे
विपत्तिग्रस्त हो कर समूल नष्ट हो जायँगे।
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सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना।
९९) इसके पश्चात्, एक बार श्री सिद्धराज ने सिद्धपुरमें रुद्रमहालय का प्रासाद बनवाना
चाहा। किसी [ प्रसिद्ध ] स्थपति ( कारीगर ) को अपने पास रखकर, प्रासादके प्रारंभ होनेके समय उसकी
कण्ठासिकाको-जो उसने किसी साहूकारके यहाँ एक लाखमें बंधक रखी थी-छुड़ा कर उसको दिलवाई।
वह बांसकी कमचियोंकी बनी हुई थी; उसे देख कर राजाने पूछा कि क्या बात है? इस पर उस स्थपतिने
कहा कि मैने महाराजकी उदारताकी परीक्षाके लिये ऐसा किया है। फिर उस द्रव्यको राजाकी अनिच्छा रहते
हुए भी लौटा दिया। फिर क्रमानुसार २३ हाथ ऊँचा सर्वाङ्गपूर्ण प्रासाद बनवाया। उस प्रासादमें अश्वपति,
गजपति, नरपति प्रभृति बड़े बड़े राजाओंकी मूर्तियाँ बनवा कर रखीं और उनके सामने हाथ जोड़े हुए अपनी
मूर्ति भी बनवाई। [ जिसका आशय यह है कि राजा ] उनसे वर माँगता है कि देशका भङ्ग करते हुए भी इस
प्रासादका कोई भंग न करें। उस मंदिर पर ध्वजारोपका उत्सव करते समय सभी जैन प्रासादोंकी पताकायें
उतरवा दी गईं। जैसे मालव देश के महाकाल के मंदिरमें जब वैजयंती चढ़ाई जाती है तब जैन प्रासादोंमें
ध्वजारोपण नहीं होने पाता।
१ यह कण्ठासिका नामका कारीगरका कोई औजार है जिसका ठीक अर्थ समझमें नहीं आता।