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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

७० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश
[ शांत करते हुए ] यों कहा—'स्वामिन् ! यदि मेरे देनेसे तुम्हारा पुण्य चला जाता है तो मैं उसका तथा अन्य
पुण्यवानोंका पुण्य इसी तरह आपको भी दे देता हूँ । और असलमें तो बात यह थी कि जिस-किसी भी उपायसे
शत्रुसेनाको स्वदेशमें प्रवेश करनेसे रोकनी जरूर थी।' ऐसा कह कर उसने नृपतिको अनुनय किया । इसके
बाद इसी अमर्षवश उसने मालव मण्डल पर चढ़ाई करनेकी इच्छा की । सहस्रलिंग [ सरोवरादि ] धर्म-
स्थानके कार्यका जो आरंभ किया गया था उसकी देखरेखका काम मंत्रियों और शिल्पियों (कारीगरों) को सौंपा।
बड़ी शीघ्रताके साथ उसका काम चलने पर राजाने युद्धके लिये प्रयाण किया । वहाँ जय-जयकारके साथ बारह
वर्ष तक युद्ध होता रहा । फिर भी जब किसी प्रकार धारा [ नगरी ] का किला नहीं टूटता दिखाई दिया तो
[ एक दिन राजाने यह ] प्रतिज्ञा की कि धारा के किलेको तोड़े बिना आज अन्न ही न खाऊँगा । सायंकाल
हो जाने पर भी ऐसा करनेमें असमर्थ होनेके कारण, सचिवोंने आटेकी बनावटी धारा बनवा कर और यहाँ पर
परमार राजपूतको अपने सैनिकों द्वारा मरवा कर, उस प्रतिज्ञाका निर्वाह कराया । इस प्रकार प्रपञ्चसे राजाने
प्रतिज्ञा तो पूरी की, लेकिन कार्यमें सफलता प्राप्त न होनेसे वापस लौटनेकी अपनी इच्छा मुञ्जाल नामक मंत्रीको
बताई । उसने अपने गुप्तचरोंको तीन रास्ते, चौराहे और चबूतरे इत्यादिक स्थानों पर भेज कर, धाराके
किलेके भग्न होनेकी बातें जाननी चाहीं । लोगोंके परस्पर वार्तालाप करते हुए, धारा के रहने वाले किसी
[ जानकार ] पुरुषने कहा कि 'दक्षिण दिशाके दरवाजेकी ओरसे शत्रुसेना हमला करे तब ही कहीं धाराके
किलेका तोड़ना सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं।' यह बात सुन कर [ उन गुप्त चर लोगोंने ] मंत्रीको सूचित
किया । उसने इस वृत्तान्तको गुप्तरूपसे राजाको विज्ञापित किया । राजाने भी यह वृत्तान्त जान कर उधर ही से
सेनाके साथ आक्रमण किया । तो भी दुर्गको बड़ा दुर्गम समझ कर राजा स्वयं ' यशःपटल ' नामक अपने
प्रधान बलवान् पत्त हाथीपर चढ़ा । उसके पीछे सामन्त नामक महारथ खड़ा रहा । त्रिपोलिया दरवाजेके दोनों
किवाड़ोंको, जिनके अंदर लोहेकी जबर्दस्त अर्गला लगी हुई थी, तोडनेके लिये उस हाथीने अपना सर्व
सामर्थ्य खर्च कर दिया । किवाड तो टूट गये लेकिन हाथीकी हड्डी भी साथमें टूट गई। महारथने
सिद्धराजको उस परसे उतारा और ज्यों ही यह स्वयं उस पर चढ़नेको उद्यत हुआ त्यों ही यह हाथी पृथ्वी पर
गिर पड़ा । यह हाथी बड़ा वीर होनेके कारण मर कर अपने यशसे धवल हो कर वडसर ग्राममें यशोधवल
नाम ग्रहण करके विनायक रूपसे अवतीर्ण हुआ ।
१३५. सिद्धिके स्तनमण्डलके तटदेशके आघातके कारण मानो जिसका दूसरा दांत टूट गया है, वह
एक दाँत धारण करनेवाला गजवदन ( विनायक ) तुम्हारा श्रेय करे ।
इस तरह उसकी स्तुति [की जाती] है । इस प्रकार दुर्गका भग्न करने पर युद्धमें आबद्ध यशोवर्माको
{ सन्धि-विग्रहादि } ६ गुणोंसे बाँध कर, उस जगह पर अपनी जगन्मान्य आज्ञाकी उद्घोषणा करवाई और
यशोवर्मा [ राजाको बन्दि बना कर अपने साथमें ले ] पत्तन में आया ।
[ पर कवियोंने ऐसी स्तुतियां पढ़ीं—]
[ ८९ ] अरे क्षत्रियो, ऐसा न समझो कि इस सिद्धराज के कृपाणने अनेक राजाओंकी सेनाका नाश
किया है इसलिये अब इसकी धार कुंठित हो गई है। नहीं नहीं; प्रचण्ड प्रतापरूप अग्निके ऊपर
आहुत हो कर यह सप्राप्तधार (=१ जिसने धारा नगरीको प्राप्त किया है, २ जिसने तेजदार
धार पाई है) कृपाण चिरकाल तक मालव रमणियोंका अश्रुजल पी कर और अधिक तेज होगा
[ ९० ] हे महाराज ! आपने शत्रुओंके विजय करनेमें दूधकी धाराके समान जो उज्ज्वल यश प्राप्त
किया है उसके कारण आपकी तलवार तो उज्ज्वल ही थी पर इन मालव-नारियोंके कज्जल
[ मिश्रित अश्रुजल ] पी पी कर, इसने, उसकी महिमा सूचक, यह कालिका धारण कर ली है । ।