प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ ] प्रबंधचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश
उसके पास भेजा। राजाने यह समझ कर कि यह वही स्त्री है, उसके साथ सप्रेम उपभोग किया और उससे उसको
गर्भाधान हो गया । फिर उसने सङ्केत बतानेके लिये राजाके हाथसे उसकी नामाङ्कित अँगूठी ले ली और अपनी
अँगुलीमें पहन ली । बादमें प्रात काल, उस दुर्विलासके कारण राजाको ग्लानि हुई और उस रहस्यमय वास्तविक
वृत्तान्तको न जानते हुए उसने प्राणत्याग करनेका सङ्कल्प किया । स्मृतिशास्त्रियोंके, ताँबेकी बनी हुई प्रतप्त
मूर्तिके साथ आलिंगन करनेसे इसका प्रायश्चित्त हो जायगा, ऐसा विधान बतलानेसे राजाने उसी प्रकार करनेकी
इच्छा की । तब उस मन्त्रीने यह सारी बात जैसी बनी थी वैसी कह सुनाई ।
( इस जगह P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक मिलते हैं - )
[ ८५ ] [ अपने ] भारी पराक्रमके कारण तो वह पिता [ भीम ] के समान हुआ । और रमणीय
आकारके कारण वह राजा अपने पुत्र [ जयसिंह-सिद्धराज ] के समान हुआ ।
[ ८६ ] बिना कर्ण ( राजाके ) के स्त्री-नेत्रोंको कहीं भी रति ( प्रीति ) नहीं प्राप्त होती थी इसी
लिये उन ( स्त्री नेत्रों ) की प्रवृत्ति कर्ण ( कान ) तक हुई । ( अर्थात् इसी लिये मानों स्त्रियोंके
नेत्र कानतक लंबे होने लगे । )
[ ८७ ] मानों कर्ण और अर्जुनके उस पुराने वैरको स्मरण करते हुए ही, उस कर्णने [ अपने ]
अर्जुन ( श्वेत ) यशको देशान्तरमें पहुँचा दिया ।
सिद्धराज जयसिंहका जन्म ।
[ ८८ ] जिस प्रकार दशरथके पुत्र मनोहर गुणोंसे युक्त श्री राम हुए उसी प्रकार इस [ कर्ण ]
का जगद्विजयी ऐसा जयसिंह नामक पुत्र हुआ ।
८५) अच्छे लग्न ( मुहूर्त ) में पैदा हुए उस पुत्रका नाम राजाने ‘जयसिंह’ ऐसा रखा । वह बालक
जब तीन वर्षका था उसी समय समवयस्क कुमारोंके साथ खेलता हुआ सिंहासनपर आरूढ हो गया । इस
बातको व्यवहार विरुद्ध समझ कर राजाने ज्योतिषियोंसे पूछा । उन्होंने निवेदन किया कि यह [ बड़ा ] आभ्युदयिक
लग्न है । राजाने उसी समय उस पुत्रका राज्याभिषेक करा दिया ।
८६) सं० ११५० पौष वदी ३ शनिवार, श्रवण नक्षत्र, वृष लग्नमें, श्री सिद्धराज का पट्टाभिषेक हुआ ।
८७) राजा स्वयं, आशापल्ली नामक ग्रामके रहनेवाले आशा नामक भीलके ऊपर युद्धके लिये
चढाई करके गया । भैरव देवीका शुभ शकुन होने पर, वहाँ कोछरव्व नामक देवीका मंदिर बनवाया [ और
वहीं शिबिर निवेश किया ] फिर, एक लाख खड्गके अधिपति उस भीलको जीत कर और उस प्रासादमें जयन्ती
देवीकी प्रतिष्ठा करके, कर्णेश्वर देवताका मंदिर और कर्णसागर तालाबसे सुशोभित कर्णावती पुरीकी
स्थापना कर खुद वहीं राज्य करने लगा । उस राजाने पत्तन में श्री कर्णमेरु नामक प्रासाद बनवाया ।
सं० ११२० चैत्र सुदि ७ से ले कर, सं० ११५० पौष वदी २ तक, २९ वर्ष ८ मास २१ दिन
इस राजाने राज्य किया ।
सिद्धराजका राज्यवर्णन – लीला वेषकका प्रबन्ध ।
८८) इसके बाद, जब श्री कर्णका स्वर्गवास हो गया तो श्रीमती उदयमति देवीका भाई
मदनपाल असमञ्जस भावसे वर्तने लगा । उसने लीला नामक वेषकको, – जिसने देवतासे वरप्रसाद पाया था
और तात्कालिक नागरिक लोग हतहृदय हो कर जिसकी काञ्चन-दान आदि पूजा द्वारा अभ्यर्थना किया