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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 181 में से

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पृष्ठ 83

कहीं भी नहीं है।' विद्वानोंके लिये भी इसका अर्थ समझना सन्दिग्ध होनेसे अणहिल्लपुरमें इसके
लिये ढौंडी पिटवाई जा रही थी तब किसी गणिकाने उस ढौंडीको छू कर विज्ञापित किया कि-( १ ) गणिका,
( २ ) तपस्वी, ( ३ ) दानेश्वर और ( ४ ) जुआडी रूप इन चार चीजोंको भेज दीजिये । उसके कहने पर
राजाने उस दूतको ये चीजें सौंप दीं। 'ऐसा ही होना चाहिये' यह कह कर दूत चारों चीजें ले कर जैसे आया
था वैसे ही वापस चला गया ।
~ इस प्रकार चार वस्तुओंका यह प्रबंध है।
*
७०) एक बार राजा भोज पौरचर्यामें घूम रहा था । उस समय किसी अभागेकी स्त्रीको-
११६. लोकमें तो ऐसा सुना जाता है कि मनुष्यको [ अपनी आयुमें ] दश दशायें आती हैं । पर
मेरे पतिकी तो एक ही [ दरिद्र ] दशा [ सदा बनी रहती ] है, सो मालूम देता है कि बाकीको
चोरोंने चुरा लिया है।
यह पढ़ते सुन कर उसकी दुरवस्था पर राजाको दया आई और प्रातः काल उसके पतिको सभामें बुला कर
उसका कुछ भी अच्छा भविष्य सोच कर, दो बिजौरे नींबुओंको, जिनमेंसे प्रत्येकमें एक एक लाखकी कीमत-
के रत्न गुप्त भावसे रखवा कर, उसे इनाममें दे दिये । उसने भी इस वृत्तान्तको कुछ न समझ कर, कुछ दाम
ले कर, साग-भाजीकी दूकान पर जा कर बेच दिये । उस (दूकानदार) ने भी उसका हाल न जान कर उन
दोनों नींबुओंको किसीको भेंट दे दिया । उस आदमीने फिर से उन्हें उसी राजा भोज को भेंट किया ।
११७. समुद्रवेलाकी चञ्चल तरंगोंसे घसीटा हुआ यदि कोई रत्न पहाड़ी नदीमें आ भी जाय तो
वह फिरसे उसी मार्गसे उसी रत्नाकर ( समुद्र ) में ही चला जाता है ।
इस अनुमानसे राजाने [ इस उदाहरणमें ] भाग्य ही को सद्य माना । क्यों कि, कहा भी है कि-
११८. वर्षा कालमें अशेष जगत्के प्रीत होने पर भी चातक तो जलका एक बूंद भी नहीं पाता ।
सच है, अलभ्य वस्तु कैसे मिल सकती है ।
इस प्रकार यह बिजौरे नींबूका प्रबंध है ।
*
७१) अन्य किसी एक रातको, राजाने अपने क्रीड़ा-शुक (तोते) को गुप्त रूपसे 'एक अच्छा नहीं
है' यह बात पढ़ा कर उसे सिखाया कि तुम प्रातः काल सभामें यही वाक्य उच्चारण करना। बादमें जब उस तोते-
ने वैसा ही कहा तो राजाने पंडितोंसे उसका मतलब पूछा । वे उसका मतलब न जानते हुए, उसके जाननेके
लिये, उन्होंने ६ महीनेकी मुहलत माँगी । इसके बाद उनका मुख्य वररुचि इसका मतलब समझनेके लिये
देशान्तरमें भ्रमण करने लगा । वहा किसी पशुपालने उससे कहा कि मैं इसका मतलब आपके स्वामीको बता
सकता हूं । पर मैं अपने इस कुत्तेके बच्चेको, बूढ़ा होनेके कारण, न तो ढो सकता हूं,-और बड़ा प्रिय होनेके
कारण, ना ही छोड़ सकता हूं। उसके ऐसा कहने पर उसे साथ लेनेकी इच्छासे वररुचिने उस कुत्तेको कपड़ेंमें
लपेट कर अपने कन्धे पर रख लिया और उस पशुपालको साथ ले कर राजाकी सभामें गया । वहाँ उसको उत्तर
देनेवाला बताया। इसके बाद, राजाने उस पशुपालसे उसी बातको पूछा । [उसने जवाब दिया-] महाराज, इस
जीवलोकमें लोग ही 'एक अच्छा नहीं है'। राजाने फिर पूछा-'कैसे ?' वह बोला-इसलिये कि यह