प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रन्थकारकी प्रशस्ति ।
बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्ध जनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा
योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं । इस कारणसे, तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम
इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबन्धोंका संघटनरूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है ॥ १ ॥
यह, प्रबन्धसंग्रहरूपी चिन्तामणि, चिरकाल तक हाथपर रहनेसे स्यमन्तक मणिका भ्रम पैदा करता है और
हृदयमें स्थापन करनेपर प्रशंसनीय ऐसे विमल कौस्तुभ मणिकी कलाका सृजन करता है । सो इस ग्रन्थके
अध्ययनसे विद्वान् लोग श्रीपति ( विष्णु ) की नाईं शोभित होते हैं ॥ २ ॥
मन्दबुद्धि हो कर भी, मैंने जैसा सुना वैसा ही, प्रबन्धोंका संकलन करके यह ग्रन्थ बनाया है । पण्डित
लोग मत्सरताका त्याग करके, अपनी प्रज्ञाके उन्मेषसे इसकी उन्नति ही करें ॥ ३ ॥
ग्रहों रूपी कौड़ियोंसे जब तक द्युलोकमें सूर्य और चन्द्रमा, जुआड़ीकी तरह क्रीड़ा करते रहें तत्र तक
आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह ग्रन्थ विद्यमान रहो ॥ ४ ॥
विक्रमादित्य संवत्के १३६१ वर्ष बीतनेपर, वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन यह ग्रन्थ समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
[ गद्यमें फिर यही कथन ] राजा श्री विक्रमके समयसे १३६१ वर्ष बीतनेपर वैशाख सुदि १५
रवि वारको, आज यहाँ श्री वर्द्धमान ( काठियावाडके आधुनिक वढवान नगर ) में यह प्रबन्धचिन्तामणि
ग्रन्थ समाप्त किया गया ।
—:०:—
परिशिष्ट
कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-सम्बन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध*
श्रीमान् हेमचन्द्रके समान तो गुरु और श्रीमान् कुमारपालके समान जिनभक्त राजा न
तो हुआ और न [ अब कभी ] होगा ॥ १ ॥
प्रभु श्री हेमाचार्यके पास ज्ञान-दान प्राप्त करके उसके पश्चात् श्री चौलुक्यचक्रवर्ती कुमारपालने जो
हिंसाका निवारण किया था उसका [ रूपकात्मक ] प्रबन्ध इस प्रकार है — एक अवसर पर, अणहिल्लपुरमें, श्री
कुमारपाल नामक राजाने, घुड़दौड़की क्रीड़ा करनेके लिये जाते समय, एक ऐसी बालिकाको देखा जिसने अपने
सौन्दर्यसे सुरसुन्दरियोंको भी मात कर दिया था और जिसका मुख बाल-चन्द्रमाके समान मनोहर था । यद्यपि वह
- टिप्पणी—यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध, इस ग्रन्थकी बहुसंख्यक पोथियोंमें लिखा हुआ मिलता है । इससे ज्ञात
होता है कि ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिने ही इसकी रचना की है—पर ऐतिहासिक न हो कर यह एक रूपकात्मक प्रबन्ध है
इसलिये इसको परिशिष्टके रूपमें ग्रन्थके अन्तमें जोड़ दिया मालूम देता है । कुमारपालने अपने धर्मगुरु आचार्य
हेमचन्द्रसूरिके पास जैनधर्मकी गृहस्थ दीक्षा ( श्रावकधर्मव्रत ) स्वीकार करते समय, सबसे पहले जब अहिंसा व्रतका स्वीकार
किया, उस समयको लक्ष्य करके इस रूपकात्मक प्रबन्धका प्रणयन किया गया है । इसमें अहिंसाको एक राजकन्या बनाई है जो
आचार्य हेमचन्द्रके आश्रममें पलकर बड़ी रूपवती—ऋद्धिमती हो गई है । अन्यान्य राजाओंके अधार्मिक आचरण देख
कर यह किसीके साथ विवाह करना नहीं चाहती; किन्तु, कुमारपाल जो आचार्य हेमचन्द्रका शिष्य बना है उसके धर्मभावसे मुग्ध
हो कर, आचार्यके आदेशसे यह उसका पाणिग्रहण कर लेती है—बस यही इस प्रबन्धका सारार्थ है ।
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