प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण २२१-२२४ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४९
वेश्याने सब वृत्तान्त कहा और स्नान-पान-भोजन आदिसे उसे सन्तुष्ट किया । फिर वह राजसभामें गया । वहा
पर पाणिनि व्याकरण की यथास्थित व्याख्या कर बतानेपर राजा तथा अन्य पंडितोंने उसका बड़ा सत्कार
किया । वहाँ जो कुछ पुरस्कार रूपमें उसे मिला वह सब उसने उस वेश्याको समर्पण कर दिया ।
२२३) फिर उसके क्रमश चारों वर्णोंकी चार स्त्रियाँ हुईं । इनमेंसे क्षत्रियाणीके गर्भसे विक्रमादित्य
तथा शूद्राके गर्भसे भर्तृहरि पुत्र हुआ । हीनजातिका होनेके कारण भर्तृहरिको रज्जुके संकेतसे भूमिगृहमें
बैठा कर गुप्त वृत्तिसे पढ़ाया जाता था । अ य तीनों लड़कोंको प्रत्यक्ष (पासमें बैठा कर) पढ़ाया जाता था ।
उन्हें इस तरह पढ़ाते हुए-
२६४. दान भोग और नाश-द्रव्यकी ये तीन गति हैं । [ और जो न देता है न भोग करता है
उसके द्रव्यकी तीसरी ही गति (नाश) होती है ।]
यह जब पढ़ाया गया तो भर्तृहरिने रज्जुका संकेत नहीं किया और उन तीनों प्रत्यक्ष छात्रोंने आगेके
उत्तरार्धका पाठ पूछा । तब कुपित होकर उस उपाध्यायने कहा-'अरे वेश्यापुत्र, अभी तक रस्सीको क्यों नहीं
हिलाता ?' तब वह प्रत्यक्ष आ कर क्रुद्ध कर शास्त्रकी निंदा करता हुआ कहने लगा-
२६५. सौ सौ प्रयास करक प्राप्त किये हुए और प्राणोंसे भी अधिक मूल्यवान् ऐसे धनकी एक दान
ही गति हो सकती है । अन्य तो [ गति नहीं ] विपत्ति है ।
इस पाठसे [ उन सबने ] वित्तकी फिर एक ही गति मानी । उस भर्तृहरिने वैराग्यशतक आदि
अनेक प्रबंध बनाये ।
इस प्रकार भर्तृहरिकी उत्पत्तिका यह प्रबंध समाप्त हुआ ।
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वाग्भट वैद्यका प्रबंध ।
२२४) धारानगरीमें, मालव मण्डलके भूषणरूप श्री भोजराज का एक आयुर्वेदज्ञ वैद्य वाग्भट
नामक था । उसने आयुर्वेदरोक्त कुपथ्य करके, उसके प्रभावसे पहले रोग उत्पन्न किया और फिर सुश्रुत कथित
पथ्य औषधोंसे उसका निग्रह किया । पानीके बिना कितने समय तक जिया जा सकता है इस बातकी परीक्षाके
लिये जल छोड़ दिया । तीन दिनके बाद प्याससे तालु और ओठ सूख गये । तब उसने इस प्रकार कहा-
२६६. कहीं गर्म, कहीं ठंडा, कहीं गर्म करके ठंडा किया हुआ और कहीं औषधके साथ [ इस प्रकार
पानी सब हालतमें दिया जाता है ] पानी कहीं भी मना नहीं किया गया है ।
इस प्रकार पानीके सत्कारका उसने यह वाक्य पढ़ा । उसने अपना अनुभूत 'वाग्भट' नामक ग्रंथ
बनाया । उसका जामाता जो लघु बाहड कहलाता था वह भी एक समय, अपने श्वसुर ऐसे उस वृद्ध बाहड के
साथ राजमंदिरमें गया । सबेरे ही श्री भोजराजके शरीरकी देख भाल कर वृद्ध बाहड (वाग्भट) ने कहा
कि- 'आज आपका शरीर नीरोग है' । तो यह सुन कर लघु बाहडने मुह मरोडा । तब श्री भोज के
उसका कारण पूछनेपर उसने कहा कि-'आज स्वामीके शरीरमें, रात्रिके शेषमें राजयक्ष्माका प्रवेश हुआ है,
जो कृष्णच्छायासे सूचित होता है' । इस प्रकार देवताके आदेशसे अतीन्द्रिय भाव बतला देनेके कारण राजा
उसके कला-कलापसे चमत्कृत हुआ और व्याधिका उससे प्रतीकार पूछा । तब उसने तीन लाखके मूल्यसे
बननेवाले रसायनका प्रयोग बताया । ६ महीनेके बाद उतना द्रव्य व्यय करके वह रसायन सिद्ध किया गया
और सायंकाल कांचकी कुप्पीमें भर कर उस रसायनको राजाके बिस्तरके पास रख दिया । सबेरे देवतार्चनके
बाद राजाने जब वह रसायन खाना चाहा तो उस रसायनकी पूजा-पुरस्कार आदि सब सामग्री तैयार की गई ।