प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण २१९-२२० ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४७
किसीको मारने लगा । अपने प्रौढ़ ज्ञानके द्वारा इन लोगोंका यह वृत्तान्त जान कर उन्होंने विघ्नकी शान्तिके लिये
'उवसग्गहरं पासं' इस नूतन स्तोत्रकी रचना की ।
इस तरह यह वराहमिहिर प्रबंध समाप्त हुआ ।
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सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त ।
२२०) ढक नामक पर्वत पर रहनेवाले रणसिंह नामक राजपूतको एक भूपल नामकी पुत्री थी जिसने
अपने सौन्दर्यसे नागलोककी बालाओंको भी जीत लिया था । उसे देख कर वासुकि नागका उस पर अनुराग
हो गया । उसने उसके साथ संभोग किया और उसमे नागार्जुन नामक पुत्र पैदा हुआ । उस पाताल पाळ
(नाग) ने पुत्रस्नेहसे मोहित हो कर उसे सभी औषधियोंके फल, मूल और पत्तोंका भक्षण कराया । इन औषधियोंके
प्रभावसे वह महासिद्धियोंसे अलङ्कृत हुआ । सिद्धपुरुष होनेके कारण पृथ्वी पर्यटन करता हुआ वह शातवाहन
नृपतिके पास गया, जहाँ उसे राजाके कलागुरु होनेकी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई । तो भी वह गगन-गामिनी
विद्याका अध्ययन करनेकेलिये श्री पादलिप्ताचार्य के पास पादलिप्तपुर गया । निरभिमान हो कर उनकी सेवा
करने लगा । भोजनके समय, पादलेपके द्वारा आकाशमें उड कर अष्टापद आदि तीर्थोंको नमस्कार करके वे
आचार्य वापस आये, तो उनके चरण धो कर रस, वर्ण और गन्धकी परीक्षासे उसमें १०७ महौषधियोंका होना
उसने जाना। बादमें गुरुकी आज्ञाकी परवा न करके उसने स्वयं वैसा ही पादलेप किया। इससे मुर्गे और मोरकी नाईं
कुछकुछ उड़ता हुआ वह एक खड्डेमें गिर पडा और चोट लगनेसे उसका सारा शरीर जर्जरित हो गया । तब गुरुने
पूछा कि 'यह क्या बात है?' तो फिर उसने वह सब वृत्तान्त यथावत् निवेदन किया । उसकी इस चतुरतासे
चकित हो कर उसके सिरपर अपना करकमल रखते हुए उन्होंने कहा कि- 'साठी चावलके पानीमें उन ओषधोंको
मिलाकर पादलेप करो और इस तरह आकाश गामी बनो' । इस तरह उनके अनुग्रहसे उसे वह सिद्धि प्राप्त
हुई। उन्हींके मुखसे यह भी सुना कि श्री पार्श्वनाथ की मूर्तिके सामने समस्त-स्त्रीलक्षणयुक्त पतिव्रताके हाथसे
निर्मर्दित हो कर जो रस सिद्ध किया जाता है वह कोटिवेधी होता है । [उसने उस मूर्तिकी गवेषणा करते
हुए जाना कि- ] पूर्व कालमें समुद्र विजय दशार्ह (यादव) ने त्रिकालवेदी श्री नेमिनाथके मुखसे सुन कर,
महातिशायी श्री पार्श्वनाथका एक रत्नमय बिंब निर्माण करके द्वारावती के प्रासादमें स्थापित किया था ।
द्वारावती के जलनेके बाद, जबसे वह पुरी समुद्रमें डूब गई तबसे, वह बिंब समुद्रमें वैसे ही विद्यमान रहा। बादमें
देवताके प्रभावसे धनपति नामक जहाजी व्यापारीका जहाज टकराया । 'यहाँ पर एक जिनबिंब है' ऐसी देवताकी
वाणी सुन कर धनपति ने वहीं नाविकोंको उसे निकालनेको कहा । उन्होंने सात कच्चे धागोंसे बांध कर उसे बाहर
निकाला और उसके प्रभावसे चिन्तितसे भी अधिक लाभ प्राप्त हुआ जान, उसे अपनी नगरीमें ले आकर अपने
बनाये हुए प्रासादमें स्थापित किया । नागार्जुन ने उस सर्वातिशायी बिंबको, अपने सिद्धरसकी सिद्धिके लिये
चुरा कर, सेढी नदी के किनारे ला कर रखा । उस बिंबके सामने, श्रीशातवाहन राजाकी एक मात्र पत्नी
चन्द्रलेखा को, सिद्धयन्त्रके द्वारा उडवा कर रोज उससे रसमर्दन करवाता । इस प्रकार यहाँ बारवार आने-
जानेके कारण उसके साथ घनिष्ट वधुभाव पैदा हो गया । इससे उसने नागार्जुन से इस रस-मर्दनका हेतु
पूछा । उसने भी अपनी कल्पनासे कोटिवेध रसका यह यथावत् वृत्तान्त कहा और वर्णनातीत रूपसे उसका सम्मान
करके उसके प्रति अनन्यसामान्य सौजन्य बताया। इसके बाद एक दिन उसने अपने पुत्रोंसे यह वृत्तान्त कहा ।
वे दोनों इसके लोभी होकर राज्यत्याग करके नागार्जुन द्वारा अलङ्कृत उस भूमिमें आ कर गुप्त वेश बना कर रहे ।
उस रसके ग्रहण करनेकी इच्छासे, जिसके यहाँ नागार्जुन भोजन किये करता था, उसे अर्थदान करके अपने