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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

२१०-२१३ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १४१
मनमें व्याकुल हो कर उस सूहवदेवीके पुत्रको अपने हाथीपर बैठा कर ( उसके साथ ) राजा गंगाके
जलमें डूब मरा।
इस प्रकार यह जयचन्द्रका प्रबंध समाप्त हुआ।
*
जगद्देव क्षत्रियका प्रबंध।
२१३) त्रिविध वीरश्रेष्ठत्वको धारण करनेवाला जगद्देव नामक एक क्षत्रिय वीर हुआ। वह श्री
सिद्धराजके द्वारा खूब सम्मानित होता था। फिर भी उसके गुणरूप मन्त्रके वशीभूत हो कर शत्रुमर्दैन
ऐसे राजा परमर्दीने जब उसे आग्रहपूर्वक अपने यहा बुलाया, तो पृथ्वीरूप रमणीके केशकलापके समान उस
कुन्तल देशमें वह गया। दरवाजेपर पहुँच कर जब उसने राजाको अपने आनेकी खबर भिजवाई उस समय
[ राजाके आगे ] एक वेश्या, नंगी हो कर 'पुष्पचलन' नृत्य कर रही थी। वह तत्काल ही लज्जित हो कर
अपनी चादर ओढ कर वहीं बैठ गई। जब राजाके द्वारपालने जगद्देवको प्रवेश कराया तो राजाने उठकर
आलिंगन दिया और प्रिय आलाप आदि किया। इस सम्मानके बाद, फिर उसे प्रधान परिधानदुकूल और लाखोंकी
कीमतके अतुलनीय ऐसे दो अन्य वस्त्र भेंट स्वरूप दिये। बादमें जगद्देवके महामूल्यवान आसन पर बैठ
जानेपर सभाका संभ्रम जब दूर हुआ, तो राजाने उस वेश्याको नाचनेका आदेश किया। तब उस उचितज्ञा चतुर
नारीने कहा कि--'संसारके एकमात्र पुरुष श्री जगद्देव नामक अब यहापर विद्यमान हैं इसलिये इनके सामने
बिना वस्त्रके नाचने में लजाती हू। स्त्रिया स्त्रियोंके सामने ही यथेष्ट चेष्टा कर सकती हैं'। उसकी इस लोकोत्तर
प्रशंसासे मनमें प्रमुदित हो कर जगद्देवने राजाके दिये हुए उन दोनों वस्त्रोंको उसे दे डाला।
इसके बाद, जब परमर्दीके प्रसादसे जगद्देवको किसी एक देशका आधिपत्य मिला तो उसे सुन-
कर उसका ऋणग्रस्त उपाध्याय उससे मिलने आया। उसने यह काव्य भेंट किया- •
२५०. हम दो आदमीके पुण्यको मानते हैं-एक तो अक्षत्रिय विधिसे वालिको मारनेवाले किसी
भगवान् (रामचन्द्र) के, और दूसरे संगीतमें आसक्त कुन्तलपतिके। इनमेंसे एक (रामचंद्र)
ने तो मरुत्तनय (हनुमान्) की दोनों सुंदर भुजाओं रूप कामधेनुका दोहन किया और दूसरे
(कुन्तलपति) ने, हे प्रतिपक्ष (शत्रु) के लिये प्रत्यक्ष परशुराम, आप जैसे चिन्तामणिको
प्राप्त किया।
इस काव्यके पारितोषिकमें उस स्थूललक्ष (लक्षण-सम्पन्न) ने आधा लाख दिया।
२५१. चकोरने पांथ (मुसाफिर) से पूछा कि 'हे मित्र! बताओ पृथ्वीमें बसने लायक वह कौनसा
देश है जहाँपर चिर कालतक रात्रि नहीं होती ?' (इसपर पांथने कहा कि) 'श्री जगद्देव
नामक पुरुष जो सुवर्णदान कर रहा है उससे थोडे ही दिनोंमें मेरु पर्वत समाप्त हो जायगा।
और फिर सूर्यका छिपना बंद हो कर एक मात्र अद्वैत ऐसा (बिना रात्रिका) दिन ही बना रहेगा।
२५२. पृथ्वीकी रक्षा करनेमें दक्ष ऐसे दाहिना हाथवाले, दाक्षिण्यकी शिक्षा देनेमें गुरुके समान,
कल्याणके स्थान और धन्यजन्म ऐसे जगद्दाता जगद्देवके विद्यमान होनेपर, विद्वानोंके घर भी
ऐसे बन गये हैं कि जिनमें प्रतिदिन, मतवाले हाथी और घोडोंके बांधने योग्य वृक्षोंकी रस्सियां
टूट जानेके कारण, नौकर लोग व्याकुल बने रहते हैं।
२५३. तुम्हारे जीवित रहते बलि, कर्ण और दधीचि जीते हैं और हमारे जीवित रहते दारिद्र्य जीता है।